मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग तेज, विरोधियों का हमला
केंद्रीय चुनाव आयोग के दो आयुक्तों ने 10 महीने में 14 बार आपत्ति दर्ज की, विरोधी दल मुख्य आयुक्त के इस्तीफे की मांग पर अड़े।
केंद्रीय चुनाव आयोग के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को तुरंत पद से हटाने की मांग देशभर के विरोधी दलों में तेज हो गई है। यह मांग एक अंग्रेजी न्यूज एजेंसी की रिपोर्ट के बाद उठी, जिसमें दावा किया गया कि पिछले 10 महीनों में तीन चुनाव आयुक्तों में से दो, यानी सुखबीर सिंग संधू और विवेक जोशी, ने कम से कम 14 बार औपचारिक रूप से आपत्ति दर्ज कराई थी। इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद राजकीय हलकों में हलचल मच गई और देशभर से ज्ञानेश कुमार के खिलाफ नाराजगी जताई जाने लगी।
रिपोर्ट के मुताबिक दोनों चुनाव आयुक्तों ने दावा किया कि कुछ अहम फैसले उनकी जानकारी के बिना पूरे चुनाव आयोग के नाम पर लिए जा रहे थे। उनका यह भी कहना बताया गया कि इनमें से कुछ फैसले "अनधिकृत और गैरकानूनी" तरीके से लिए गए। इसी बीच पॉलिटिकल पार्टी सीजेपी (CJP) ने गुरुवार, 24 सितंबर को अपने सभी नियोजित कार्यक्रम रद्द कर दिए। पार्टी की तरफ से बताया गया कि पार्टी नेतृत्व "भारतीय लोकतंत्र के अपहरण" विषय पर दोपहर में दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस करेगा।
इन आरोपों पर भारतीय चुनाव आयोग ने बुधवार को सफाई दी। आयोग ने साफ किया कि उसका पूरा कामकाज कानून और आयोग के निर्देशों के मुताबिक ही हुआ है। आयोग ने कहा कि पिछले 10 महीनों में मंजूर हुए प्रस्तावों, लिए गए फैसलों, जारी हुए निर्देशों और तमाम गतिविधियों की बड़ी संख्या को नजरअंदाज करके सिर्फ कुछ अंदरूनी नोट्स या टिप्पणियों पर ध्यान देना "तस्वीर का सिर्फ एक पहलू दिखाना" है।
वहीं भाजपा ने भी विरोधियों के इन आरोपों पर जवाब दिया। भाजपा का कहना था कि आधिकारिक बहस के दौरान तीन चुनाव आयुक्तों के अलग-अलग मत सामने आना यह दिखाता है कि चुनाव आयोग लोकतांत्रिक तरीके से काम कर रहा है। पार्टी ने कहा कि इससे विरोधियों का यह आरोप गलत साबित होता है कि चुनाव आयोग "तानाशाही तरीके" से काम कर रहा है। भाजपा मुख्यालय में प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए पार्टी के प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि आधिकारिक बहसों में चुनाव आयुक्तों के अलग-अलग विचार सामने आने की खबरें "असली लोकतंत्र की निशानी" हैं।
फिलहाल यह मामला केंद्र में विरोधी दलों और भाजपा के बीच आरोप-प्रत्यारोप का मुद्दा बना हुआ है, जबकि चुनाव आयोग खुद अपने कामकाज के पारदर्शी होने की बात दोहरा रहा है।
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