कराड तालुके को पूरी तरह दुष्काळग्रस्त घोषित करने की पृथ्वीराज चव्हाण की मांग
राज्य सरकार ने महाराष्ट्र के २६५ तालुकों में दुष्काळ घोषित किया, लेकिन कराड इस सूची में शामिल नहीं है। पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से पूरे तालुके को दुष्काळग्रस्त घोषित करने की मांग की है।
महाराष्ट्र सरकार ने राज्य के ३५८ में से २६५ तालुकों में दुष्काळ घोषित किया है, मगर कराड तालुका इस सूची से बाहर रह गया है। पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण का कहना है कि कराड के कुछ हिस्सों में बारिश न होने से हालात गंभीर हो गए हैं और किसान मुश्किल में फंस गए हैं। इसी वजह से उन्होंने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से पूरे कराड तालुके को दुष्काळग्रस्त घोषित करने की मांग की है।
चव्हाण ने सोशल मीडिया पर पोस्ट डालकर कराड तालुके की स्थिति पर अपनी बात रखी है। उनके मुताबिक कराड तालुके का खरीप क्षेत्र करीब ३२ हजार ५०० हेक्टर है। इसमें से १३ हजार ५०० हेक्टर क्षेत्र सिंचन के दायरे में आता है, जबकि करीब १९ हजार हेक्टर क्षेत्र जिरायती यानी बारिश पर निर्भर है। ऐसे में बारिश समय पर न हुई तो इसका सीधा असर जिरायती खेती पर पड़ता है।
चव्हाण के अनुसार कराड तालुके की उंडाळे, येवती, काले, मसूर, इंदोली और उंब्रज इन छह महसूल मंडलों में दुष्काळ की स्थिति गंभीर है। उनका कहना है कि सिर्फ कुछ मंडलों को ध्यान में रखकर फैसला लेने की बजाय पूरे तालुके की असल स्थिति को देखते हुए कराड को दुष्काळग्रस्त घोषित किया जाना चाहिए।
इसके अलावा चव्हाण ने राज्य के उन ९३ तालुकों का मंडलनिहाय सर्वे कराने की भी मांग रखी है, जहां अभी तक दुष्काळ घोषित नहीं हुआ है। उनका कहना है कि अगर किसी तालुके के ज्यादातर महसूल मंडल 'ट्रिगर-१' के मापदंडों में फिट बैठते हैं, तो उस पूरे तालुके को दुष्काळग्रस्त तालुकों की सूची में शामिल किया जाना चाहिए।
चव्हाण ने यह भी कहा कि दुष्काळ की मौजूदा स्थिति से निपटने के लिए जलसंधारण के काम भी तुरंत शुरू किए जाने चाहिए। उन्होंने नई साखळी बंधारे बनाने को प्राथमिकता देने और पुराने बंधारों की गाळ निकालने का काम फौरन शुरू करने की मांग की है।
चव्हाण के मुताबिक, अगर ये काम रोहयो और मनरेगा के तहत किए जाएं तो ग्रामीण इलाकों के लोगों को रोजगार भी मिलेगा और साथ ही पानी का भंडार भी बढ़ेगा - यानी इससे दोहरा फायदा होगा। अब कराड तालुके को लेकर राज्य सरकार क्या फैसला लेती है, इस पर किसानों और ग्रामीण इलाके की नजरें टिकी हैं।
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