स्कॉच पुरस्कार के बाद श्रेय पर विवाद, मंत्री प्रताप सरनाईक ने योगदान का जिक्र न होने पर जताई नाराजगी
मिरा-भाईंदर के SCWC प्रोजेक्ट को स्कॉच पुरस्कार मिलने के बाद मंत्री प्रताप सरनाईक और महापालिका के बीच श्रेय को लेकर विवाद उठा है।
मिरा-भाईंदर महानगरपालिका के सौरनियंत्रित विंड्रो कंपोस्टिंग (SCWC) प्रोजेक्ट को राष्ट्रीय स्तर का प्रतिष्ठित 'स्कॉच' पुरस्कार मिला है। अब इस पुरस्कार के श्रेय को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में विवाद शुरू हो गया है। परिवहन मंत्री और मिरा-भाईंदर के जनप्रतिनिधि प्रताप सरनाईक के समर्थकों का कहना है कि प्रोजेक्ट के लिए फंड दिलाने का पीछा सरनाईक ने किया, संकल्पना को आगे बढ़ाया और प्रोजेक्ट खड़ा करने को गति दी। समर्थकों के मुताबिक पुरस्कार लेते समय उनके योगदान का सीधा जिक्र तक नहीं किया गया।
यह SCWC प्रोजेक्ट महापालिका के घनकचरा प्रबंधन विभाग ने खड़ा किया है। SKOCH के आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक यह महापालिका का प्रोजेक्ट है और इसकी क्षमता रोजाना करीब 20 से 25 टन गीले कचरे पर प्रोसेसिंग की है। सौर ऊर्जा से गीले कचरे की प्रोसेसिंग कर कंपोस्ट बनाने के इस तरीके से लैंडफिल पर कचरे का बोझ घटने का दावा किया गया है।
दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर में हुए समारोह में महापालिका की ओर से आयुक्त राधाबिनोद शर्मा, उपमहापौर ध्रुवकिशोर पाटील और उपायुक्त डॉ. सचिन बांगर ने पुरस्कार लिया। शहर के कचरा प्रबंधन को राष्ट्रीय स्तर पर मिला यह सम्मान प्रशासन के लिए अहम पड़ाव माना जा रहा है। लेकिन पुरस्कार मिलते ही सवाल उठ गया है कि श्रेय किसका है।
सरनाईक समर्थकों के कहने के मुताबिक तत्कालीन मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के जरिए कचरा और खाद प्रबंधन के लिए बड़ा फंड दिलाने का पीछा प्रताप सरनाईक ने किया था। इस फंड से शहर में कई कचरा प्रोसेसिंग प्रोजेक्ट को गति मिली। समर्थकों का रुख है कि महापालिका को राष्ट्रीय पुरस्कार मिल रहा है तो फंड के पीछे के राजनीतिक पीछा का भी जिक्र होना चाहिए था। उनका सवाल है कि महापालिका प्रोजेक्ट लागू करती है, यह मंजूर है, लेकिन फंड लाने और राजनीतिक पीछा करने वालों का योगदान कहां है। इससे राष्ट्रीय पुरस्कार की खुशी से ज्यादा 'श्रेयवाद' मिरा-भाईंदर की राजनीति में चर्चा में आ गया है।
इसी बीच मिरा रोड के पेणकरपाडा, आरक्षण क्रमांक 343 पर प्रस्तावित सोलराइज्ड मेकैनिकल कंपोस्टिंग प्रोजेक्ट का मुद्दा भी फिर उठा है। रोजाना 20 टन गीले कचरे की क्षमता वाले इस प्रोजेक्ट की मंजूर लागत करीब 9.44 करोड़ रुपये बताई जा रही है। दावा किया गया है कि सबस्ट्रक्चर तक का काम होने के बाद महापालिका ने वर्क ऑर्डर रद्द कर दिया।
सरनाईक समर्थकों का दावा है कि इस प्रोजेक्ट पर दो करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च हो चुका है। उनकी दलील है कि प्रोजेक्ट पूरा होता तो गीले कचरे का निपटारा स्थानीय स्तर पर हो जाता और उत्तन इलाके के कचरे का बोझ कुछ कम होता। सवाल उठ रहा है कि एक तरफ ऐसे ही प्रोजेक्ट को राष्ट्रीय पुरस्कार मिल रहा है, तो दूसरी तरफ पेणकरपाडा का प्रोजेक्ट क्यों रोका गया। समर्थकों का आरोप है कि राजनीतिक मतभेद और स्थानीय विरोध की वजह से यह प्रोजेक्ट पूरा नहीं हो सका। इन आरोपों पर महापालिका प्रशासन का आधिकारिक पक्ष अभी सामने नहीं आया है।
मंत्री प्रताप सरनाईक ने प्रशासन के रुख पर नाराजगी जताई है। उनके कहने के मुताबिक कचरा प्रबंधन के लिए फंड दिलाने का पीछा किया गया और कई प्रोजेक्ट खड़े हुए, लेकिन पुरस्कार मिलने के बाद उन प्रोजेक्ट के पीछे की संकल्पना और फंड के लिए हुई कोशिशों का जिक्र न होना खेद की बात है।
सरनाईक ने कहा बताया जाता है, "फंड हम लाएं, प्रोजेक्ट खड़े करें और पुरस्कार मिलने के बाद उस संकल्पना के पीछे के विजन और योगदान का जिक्र तक न हो, यह खेद की बात है।" सरनाईक का यह भी कहना है कि पेणकरपाडा प्रोजेक्ट पूरा होता तो शहर के कचरा प्रबंधन को और बड़ी गति मिलती।
अब मिरा-भाईंदर के लोगों की नजर इस पर है कि इन आरोपों पर महापालिका प्रशासन क्या सफाई देता है और SCWC प्रोजेक्ट की कामयाबी के पीछे फंड, संकल्पना और अमल का श्रेय किस तरह बताता है।