महाराष्ट्र में 265 तालुका सूखाग्रस्त, मराठवाड़ा की 80 फीसदी फसल चौपट
मानसून की विदाई के साथ महाराष्ट्र में सूखे का संकट सामने है। मराठवाड़ा में फसलें बर्बाद हुईं, लातूर के जलाशय खाली हो रहे हैं और राज्य के 265 तालुका सूखाग्रस्त घोषित हैं।
मानसून ने 3 अक्टूबर 2026 को मुंबई से आधिकारिक तौर पर विदाई ले ली। लेकिन इस बार जाते-जाते वह सूखी जमीन और किसानों की आंखों में आंसू छोड़ गया है। मौसम विभाग के आंकड़ों के मुताबिक यह मानसून 2001 के बाद का चौथा सबसे कमजोर मानसून रहा।
पूरे देश में बारिश औसत से 12.6 फीसदी कम रही। देशभर में 51 फीसदी इलाके में सूखे जैसे या सूखे हालात बन गए। हालत एक जैसी नहीं रही। कहीं 17 साल की सबसे कम बारिश हुई, तो कहीं रिकॉर्ड बारिश दर्ज हुई।
शुरुआत ही निराशाजनक थी। जून में देशभर में औसत से 35 फीसदी कम बारिश हुई। बंगाल की खाड़ी में मानसून को ताकत देने वाले कम दबाव के क्षेत्रों की भारी कमी रही। इस वजह से समुद्र से नमी लाने वाली हवाएं वक्त पर देश के अंदरूनी हिस्सों तक नहीं पहुंच सकीं।
जुलाई में थोड़ी राहत मिली और बारिश औसत तक पहुंची। मगर अगस्त और सितंबर, जो दो अहम महीने हैं, उनमें बारिश ने फिर मुंह फेर लिया। नतीजा यह कि जून से सितंबर के चार महीनों में देश में सिर्फ 759.4 मिलीमीटर बारिश दर्ज हुई, जबकि आम तौर पर 868.6 मिलीमीटर होनी चाहिए थी। यानी करीब 109 मिलीमीटर की कमी रही।
ओडिशा जैसे राज्यों में बंगाल की खाड़ी के कम दबाव के सिस्टम से रिकॉर्ड बारिश हुई और वहां के किसानों को राहत मिली। दूसरी तरफ महाराष्ट्र, कर्नाटक और कुछ और राज्यों में यही बारिश बहुत दूर रही।
महाराष्ट्र के लिए यह मानसून किसी श्राप जैसा साबित हुआ, और सबसे बुरा हाल मराठवाड़ा का है। लातूर, बीड, परभणी और धाराशिव जैसे जिलों में जून से सितंबर के बीच 679.5 मिलीमीटर बारिश होनी थी, लेकिन असल में सिर्फ 424.5 मिलीमीटर हुई।
इतनी कम बारिश से खरीफ का मौसम पूरी तरह बर्बाद हो गया। सोयाबीन की फसल पीली पड़कर सूख गई, कपास की बढ़त रुक गई, और तुअर व दूसरी दालों के अंकुर मिट्टी में ही जल गए। मराठवाड़ा के किसानों के खेतों की करीब 80 फीसदी फसल पूरी तरह खत्म हो चुकी है।
हालत यह है कि जिन फसलों से चार पैसे हाथ में आने की उम्मीद थी, उन्हीं सूखी फसलों को खेत से उखाड़कर फेंकने और खेत साफ करने के लिए अब किसानों को फिर पैसा खर्च करना पड़ रहा है। इसके लिए कोई गहने बेच रहा है, तो कोई उधार ले रहा है। जुताई से कटाई तक का पूरा खर्च पानी में चला गया और किसान आर्थिक चक्कर में फंस गया है।
असर सिर्फ फसलों पर नहीं पड़ा। पीने के पानी और जमीन के भीतर के पानी पर भी बुरा असर हुआ है। लातूर जिले के 158 छोटे-बड़े जलाशयों में अब सिर्फ 12.5 फीसदी पानी बचा है। घटते पानी को देखकर गांव वालों को 1972 के भयंकर अकाल की याद आ रही है। गांवों में महिलाओं को पीने के पानी के लिए मीलों भटकना पड़ रहा है। जानवरों के लिए पानी और चारे की कमी से गांव की अर्थव्यवस्था डगमगाने की कगार पर है।
इस हालात को देखते हुए राज्य सरकार ने 26 सितंबर को राज्य के 358 में से 265 तालुका को सूखाग्रस्त घोषित किया। यह करीब 74 फीसदी इलाका है। प्रशासन को नुकसान के पंचनामे करने के आदेश दिए गए हैं। टैंकर से पानी की सप्लाई और जानवरों के लिए चारा छावनी शुरू करने की तैयारी चल रही है। फिर भी किसानों को डर है कि नुकसान के मुकाबले मिलने वाली मदद बहुत कम पड़ेगी।
इस सूखे का सीधा असर अनाज के उत्पादन और देश की खाद्य सुरक्षा पर पड़ेगा। दालों, सोयाबीन और मोटे अनाज की पैदावार में बड़ी गिरावट से आने वाले दिनों में बाजार में अनाज की तंगी की आशंका है। इससे सब्जी से लेकर दाल तक के भाव बढ़ेंगे और आम आदमी की जेब पर बोझ पड़ेगा।
अब किसानों के सामने अगली फसल का सवाल है। जिनकी कमर पहले ही टूट चुकी है, उनके पास रबी के बीज, खाद, मजदूरी और सिंचाई के लिए पैसा कहां से आएगा? कर्ज में डूबा किसान अब बैंकों और साहूकारों के दरवाजे पर खड़ा होगा। मानसून चला गया है और पीछे सूखे खेत, खाली कुएं और हताश किसान रह गए हैं। वक्त पर ठोस कदम नहीं उठे, तो यह सूखा सिर्फ आर्थिक नहीं, इंसानी संकट बनकर महाराष्ट्र के सामने खड़ा होगा।
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