मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

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15:47 IST

रबी सीझन में एल निनो का खतरा: गेहूं, दलहन और तिलहन की पैदावार पर संकट के संकेत

कृषि सचिव आतिश चंद्र ने कहा, एल निनो के असर से रबी फसलों को सही वक्त पर नमी मिलना मुश्किल हो सकता है, जिसका सीधा असर उत्पादन और बाजार भाव पर पड़ सकता है।

रबी सीझन में एल निनो का खतरा: गेहूं, दलहन और तिलहन की पैदावार पर संकट के संकेत
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

मानसून के दौरान कम बारिश की टेंशन तो पहले से ही बनी हुई है, अब आने वाले रबी सीजन पर भी मौसम की नई मुसीबत मंडराने लगी है। कृषि सचिव आतिश चंद्र ने कहा है कि एल निनो के असर से रबी फसलों को सही टाइम पर और पर्याप्त नमी मिलने को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। इसका सीधा असर गेहूं, सरसों, दलहन और तिलहन जैसी अहम फसलों की पैदावार पर पड़ सकता है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि इसका असर सिर्फ किसानों की पैदावार तक सीमित रहेगा या आगे चलकर अनाज की उपलब्धता से लेकर बाजार की महंगाई तक इसका असर दिखेगा।

रबी सीजन में गेहूं, सरसों और बाकी बड़ी फसलों की बुआई आमतौर पर अक्टूबर से शुरू होती है। इसलिए बुआई से पहले और फसलों की शुरुआती ग्रोथ के दौरान जमीन में नमी का होना बहुत मायने रखता है। इस साल कुछ इलाकों में बारिश की कमी रही है, तो कुछ जगहों पर बाद में हुई बारिश से जमीन में जरूरत से ज्यादा नमी हो गई है, यानी दोनों तरह की स्थितियां बनी हैं।

कृषि सचिव के मुताबिक आने वाला रबी सीजन खासकर उन इलाकों के लिए मुश्किल भरा हो सकता है जो बारिश पर निर्भर हैं। उनका कहना है कि इस सीजन में उत्पादन पर बड़े स्तर पर असर पड़ने की आशंका है। हालांकि इसका मतलब यह कतई नहीं निकाला जा सकता कि पूरे देश में सभी रबी फसलों का उत्पादन तय रूप से घट ही जाएगा, क्योंकि असर हर इलाके, बारिश की मात्रा, जमीन की नमी, सिंचाई की सुविधा और फसल की स्टेज के हिसाब से अलग-अलग हो सकता है।

एल निनो के मुमकिन असर से हर जगह एक जैसा मौसम नहीं बनेगा। कुछ राज्यों में जमीन में जरूरत से ज्यादा नमी बनी रह सकती है, तो जहां कम बारिश हुई है वहां नमी की कमी लंबे टाइम तक बनी रह सकती है। दोनों ही हालात रबी फसलों के लिए परेशानी खड़ी कर सकते हैं। ज्यादा नमी से बुआई का टाइम, बीज उगने और फसल की ग्रोथ पर असर पड़ सकता है, वहीं नमी कम रहने पर फसलों को जरूरी पानी नहीं मिलेगा और सिंचाई पर निर्भरता बढ़ जाएगी। इसी वजह से कृषि सचिव ने कहा कि पूरे देश के लिए एक ही रणनीति बनाने के बजाय हर इलाके के हिसाब से अलग प्लानिंग की जरूरत है।

भारत में रबी फसलों की बुआई करीब 638 लाख हेक्टेयर एरिया में होती है, जिसमें से 300 लाख हेक्टेयर से ज्यादा जमीन पर सिर्फ गेहूं बोया जाता है। दलहन की खेती करीब 140 लाख हेक्टेयर, तिलहन की 87 लाख हेक्टेयर और भरड़धान्य यानी मोटे अनाज की खेती करीब 55 लाख हेक्टेयर में होती है। मौसम में बड़ा बदलाव आया तो इन फसलों की पैदावार पर असर होगा, जिसका सीधा असर कृषि के बड़े हिस्से पर पड़ सकता है। गेहूं देश का मुख्य अनाज है, इसलिए इसके उत्पादन में बदलाव से अनाज की कुल उपलब्धता पर असर पड़ सकता है। दलहन और तिलहन का मामला अलग है, अनाज के मामले में भारत काफी हद तक आत्मनिर्भर हो चुका है, लेकिन दलहन, तिलहन और कुछ बागवानी उत्पादों के लिए देश को अब भी आयात पर निर्भर रहना पड़ता है।

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या उत्पादन घटने से महंगाई बढ़ेगी। किसी फसल का उत्पादन कम हो और बाजार में उसकी उपलब्धता उसी हिसाब से घट जाए, तो उस फसल के दाम पर दबाव बनने की आशंका रहती है। खासकर जिन चीजों के लिए देश को आयात करना पड़ता है, वहां घरेलू उत्पादन कम होने पर आयात की जरूरत बढ़ सकती है। लेकिन रबी उत्पादन घटने का मतलब यह नहीं कि तुरंत महंगाई बढ़ ही जाएगी। बाजार के दाम उत्पादन के अलावा आयात, सरकारी स्टॉक, डिमांड, इंटरनेशनल कीमतों और सरकारी पॉलिसी जैसी कई चीजों पर निर्भर करते हैं। इसलिए अभी के स्टेज पर यह कहना सही नहीं होगा कि एल निनो से महंगाई तय रूप से बढ़ेगी, बल्कि यह कहना ज्यादा ठीक रहेगा कि उत्पादन और उपलब्धता पर असर पड़ा तो कुछ कृषि उत्पादों के दाम पर दबाव आ सकता है।

कृषि सचिव का कहना है कि क्लाइमेट चेंज को अब आगे की समस्या मानने के बजाय आज की हकीकत मानकर चलना होगा। सिंचाई की सुविधा वाले इलाकों में भी कहीं-कहीं बेमौसम और तेज बारिश से फसलों का नुकसान हुआ है। इससे यह बात साफ होती है कि किसानों के लिए सिर्फ बारिश कम होना ही समस्या नहीं रह गई, बल्कि बारिश का टाइम, उसकी तीव्रता और उसका बंटवारा भी उतना ही अहम हो गया है।

इस हालात में किसानों को फसल विविधीकरण अपनाने की सलाह दी गई है, यानी एक ही फसल पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय मौसम और लोकल हालात के हिसाब से अलग-अलग फसलों का ऑप्शन अपनाया जाए। हालांकि फसल विविधीकरण लागू करना इतना आसान भी नहीं है, इसमें कृषि रिसर्च, मौसम के हिसाब से एडजस्ट होने की क्षमता और किसानों की कमाई जैसी दिक्कतें आती हैं। इसलिए सिर्फ फसल बदलने की सलाह देने से बात नहीं बनेगी, किसानों को सही टेक्नोलॉजी, मार्केट, सिंचाई और आर्थिक सहारे की भी जरूरत होगी।

पानी के सही इस्तेमाल के लिए 'प्रति बूंद अधिक फसल' और मिट्टी की सेहत से जुड़ी स्कीमें चलाई जा रही हैं। कृषि सचिव का कहना है कि इन स्कीमों को सिर्फ इस आधार पर नहीं आंका जाना चाहिए कि कितना सब्सिडी बांटी गई, बल्कि इस बात पर आंका जाना चाहिए कि किसानों को असल में कितना फायदा हुआ। राज्य सरकारों से भी अपील की गई है कि वे किसानों की कमाई में असल सुधार लाने वाले नतीजों पर ज्यादा ध्यान दें।

अक्टूबर से रबी सीजन की बुआई शुरू होने वाली है, इसलिए आने वाले कुछ हफ्ते बेहद अहम रहेंगे। एल निनो का असर, बारिश का बंटवारा, जमीन की नमी और सिंचाई की सुविधा, इन सब पर फसलों की शुरुआत काफी हद तक निर्भर करेगी। फिलहाल जो जानकारी सामने है उसके मुताबिक रबी सीजन के सामने मौसम की चुनौती तय है, लेकिन उत्पादन कितना घटेगा या किस फसल पर कितना असर पड़ेगा, यह अभी से पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता। इसलिए किसानों, राज्य सरकारों और केंद्र सरकार के लिए इलाकेवार प्लानिंग, मौसम पर लगातार नजर, पानी का सही मैनेजमेंट और फसल विविधीकरण जैसी बातें अहम रहेंगी। एक तरफ किसानों की पैदावार बचाना और दूसरी तरफ ग्राहकों के लिए अनाज के दाम काबू में रखना, यह दोहरी चुनौती आने वाले रबी सीजन में झेलनी पड़ सकती है।

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