रोहित पवार का सरकार से सवाल, फैसला नहीं ले सकते तो मुख्यमंत्री को भेजो बांध पर
परभणी में किसानों के नुकसान का दौरा करते हुए रोहित पवार ने राज्य सरकार की मदद प्रक्रिया पर सवाल उठाए और हेक्टरी 50 हजार रुपये तत्काल मदद की मांग की।
महाराष्ट्र में पिछले एक महीने से बारिश गायब है और इस वजह से कई इलाकों के किसान मुश्किल में फंस गए हैं। बारिश न होने से फसलों का नुकसान हो रहा है, और कुछ जगहों पर किसानों ने अपनी फसलों पर नांगर फिराना शुरू कर दिया है। इस बीच राज्य के मंत्री सूखाग्रस्त इलाकों का दौरा करके किसानों से बातचीत कर रहे हैं, लेकिन सूखा जाहीर करने और मदद को लेकर अभी तक कोई ठोस फैसला नहीं हुआ है। इसी वजह से विपक्ष की तरफ से राज्य सरकार पर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं।
परभणी जिले में किसानों के नुकसान का जायजा लेने गए विधायक रोहित पवार ने सरकार की मदद प्रक्रिया पर तीखी टिप्पणी की। उनका कहना था कि किसान मंत्रियों से मदद के बारे में पूछते हैं, लेकिन मंत्री यह कहकर टाल देते हैं कि फैसला तो मुख्यमंत्री ही लेंगे। रोहित पवार ने पूछा कि अगर फैसला मुख्यमंत्री को ही लेना है, तो फिर मंत्री और राज्यमंत्री किसानों के खेत की मेड़ों तक जाते ही क्यों हैं।
"अगर मंत्रियों में फैसला लेने की क्षमता ही नहीं है, तो फिर आप किसानों की मेड़ों पर घूमते किसलिए हो? मुख्यमंत्री को ही मेड़ पर भेज दो और उनसे फैसला लेने को कहो," इन शब्दों में रोहित पवार ने सरकार पर निशाना साधा।
रोहित पवार ने मांग की कि सूखे और बारिश की कमी से जिन किसानों का नुकसान हुआ है, उन्हें तुरंत हेक्टरी 50 हजार रुपये की मदद दी जाए। उन्होंने यह भी मांग रखी कि पिछले साल का बकाया फसल बीमा और इस साल का फसल बीमा भी किसानों को पूरी तरह मिलना चाहिए। इसके अलावा उन्होंने जानवरों के लिए चारा छावनियां शुरू करने, चारे की उपलब्धता सुनिश्चित करने और पीने के पानी की समस्या को तुरंत सुलझाने की मांग भी की।
रोहित पवार ने परभणी के सांसद संजय जाधव पर भी निशाना साधा। उनका कहना था कि जाधव को किसानों की समस्याएं सुलझाने के बजाय काजू-बदाम खाने में ज्यादा दिलचस्पी है। जाधव ने उद्धव ठाकरे का साथ छोड़ते समय कहा था कि वे "विकास के लिए जा रहे हैं", इसका हवाला देते हुए रोहित पवार ने पूछा कि आखिर वे किसका विकास करेंगे, परभणी की जनता का या अपना।
राज्य में बारिश की स्थिति, फसलों के नुकसान और सूखे की मांग को लेकर अब किसानों की नजरें सरकार के फैसले पर टिकी हैं।
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