मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

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17:25 IST

मराठवाड़ा में सूखे से तबाही: 25 फीसदी फसल बर्बाद, किसानों ने मांगी सीधी मदद

नांदेड समेत मराठवाड्याभर में सुखे ने खेती चौपट कर दी है, महिलाओं को दो किलोमीटर दूर से पानी लाना पड़ रहा है, और अब सरकार ने बावनकुळे की अध्यक्षता में मंत्रिमंडल उपसमिति बनाई है।

मराठवाड़ा में सूखे से तबाही: 25 फीसदी फसल बर्बाद, किसानों ने मांगी सीधी मदद
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

महाराष्ट्र में इस साल फिर सुखे ने भयानक रूप ले लिया है। डेढ़ से दो महीने बारिश गायब रहने से खेतों में फसलें सूख गई हैं, पीने के पानी के लिए महिलाओं को दूर तक भटकना पड़ रहा है, और काम न होने से नौजवान रोजगार की तलाश में गांव छोड़ने को मजबूर हैं। मराठवाड़ा इलाका इस वक्त इसी भीषण दौर से गुजर रहा है।

नांदेड जिले में हालात इतने खराब हो गए हैं कि खेत में खड़ी बर्बाद फसल देखकर महिला किसानों के आंसू नहीं रुक रहे। एक तरफ किसान खेत में बेबस खड़ा है, दूसरी तरफ प्रशासनिक दौरे और राजनीतिक बैठकों का सिलसिला लगातार चल रहा है। इसी को लेकर नांदेड के किसान भड़क उठे हैं और सरकार से साफ कहा है, "कागजी सर्वे नहीं, सीधी मदद चाहिए।"

नांदेड जिले के तळणी और कांचननगर इलाके में सुखे की भयावहता आंखों से साफ दिखती है। बारिश के लंबे अंतराल की वजह से सोयाबीन और कपास की फसल पूरी तरह जल गई है। ऊपर से खेत हरा-भरा दिखता है, लेकिन सोयाबीन की फलियों में दाना ही नहीं भरा। इससे फसल पर लगाई गई लागत भी निकलनी मुश्किल हो गई है।

दाभड (तालुका अर्धापुर) के किसान आत्माराम टेकाळे अपने सूखे खेत में खड़े होकर यही बेबसी बयां करते हैं। उनका कहना है, "खड़ी फसल सूख गई है, फलियों में दाना नहीं है, अब यह फसल काटें कैसे और मजदूरी का खर्च कैसे निकालें?"

इस संकट की सबसे बड़ी मार परिवार की महिलाओं पर पड़ रही है। सितंबर महीने से ही गांव वालों को पीने का पानी लाने के लिए दो-दो किलोमीटर दूर जाना पड़ रहा है। जिस मौसम में आमतौर पर झमाझम बारिश की उम्मीद रहती है, उसी दौरान पानी के लिए पैदल भटकना पड़ रहा है, और आगे के मुश्किल महीने कैसे कटेंगे, इस सोच में महिलाओं की आंखों से आंसू छलक रहे हैं। सुखे का असर सिर्फ खेती तक सीमित नहीं रहा। खेती में काम न बचने से रोज कमाई पर जीने वाले मजदूरों के हाथ खाली हैं। पैसों की तंगी की वजह से स्कूल-कॉलेज में पढ़ने वाले छात्रों को पेट भरने और परिवार का सहारा बनने के लिए पुणे-मुंबई जैसे शहरों का रुख करना पड़ रहा है। एक तरफ फसल का नुकसान, दूसरी तरफ रोजगार की कमी, और तीसरी तरफ बच्चों की पढ़ाई पर संकट, इस तिहरे फंदे में किसान फंसा है।

इसी हालात का जायजा लेने राजनीतिक नेता और प्रशासनिक अफसर खेतों की मेड़ पर पहुंचे, लेकिन हमेशा की तरह सिर्फ सर्वे और पंचनामे का खेल चलता देख किसानों का गुस्सा भड़क उठा। नाराज किसानों ने प्रशासन को सीधी चुनौती दी, "अफसर पूरे खेत में घूमकर 1 किलो सोयाबीन निकालकर दिखाएं, बदले में हम पूरे गांव से चंदा जमाकर उन्हें 1 क्विंटल काजू-बादाम-पिस्ता खिलाएंगे।" यह ताना सिर्फ गुस्सा नहीं, बल्कि किसान के मन की बेबसी और नाइंसाफी के खिलाफ फूटा गुबार था।

मराठवाड़ा के सभी 8 जिलों में बारिश के अंतराल की भारी मार पड़ी है, और शुरुआती अंदाजे के मुताबिक करीब 25 फीसदी फसल जल चुकी है। सोयाबीन, कपास, मक्का और तूर जैसी मुख्य फसलों का बड़ा नुकसान हुआ है। नाशिक जिले के नांदगाव तालुका समेत कई इलाकों में भी यही हाल है।

स्थानीय लोग मौजूदा हालात की तुलना सीधे 1972 के ऐतिहासिक सुखे से कर रहे हैं, लेकिन आज और तब की खेती में जमीन-आसमान का फर्क है। आज बीज, खाद, कीटनाशक और छिड़काव का खर्च बेतहाशा बढ़ चुका है, इसलिए फसल हाथ से निकलते ही किसानों पर कर्ज का बड़ा बोझ खड़ा हो जाता है।

इसी गंभीर हालात को देखते हुए राष्ट्रवादी कांग्रेस (शरदचंद्र पवार) पार्टी के नेता जयंत पाटील ने कर्नाटक की तर्ज पर महाराष्ट्र में तुरंत सुखा घोषित करने की मांग की है। साथ ही शरद पवार ने भी मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को पत्र लिखकर कर्जमाफी, फसल बीमा, चारा छावनी, टैंकर और मनरेगा के काम तुरंत शुरू करने की गुजारिश की है। किसानों के इस गुस्से का संज्ञान लेते हुए मुंबई में हुई राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में अहम फैसले लिए गए। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में राज्य में सुखा निवारण के लिए मंत्रिमंडल उपसमिति बनाने का फैसला हुआ। राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुळे इस समिति के अध्यक्ष होंगे, और सुखे को लेकर तुरंत फैसला लेने का पूरा अधिकार इस समिति को दिया गया है।

बैठक में यह भी तय हुआ कि अब तक मिले आंकड़ों के आधार पर शनिवार तक सुखे की पहली प्रारंभिक अधिसूचना जारी की जाएगी। सभी मंत्री और जनप्रतिनिधि सीधे खेतों की मेड़ पर जाकर हालात का जायजा लेंगे और किसानों की शिकायतें सुनेंगे। केंद्र सरकार को एनडीआरएफ (NDRF) के मानकों के मुताबिक मदद का प्रस्ताव भेजा जाएगा, लेकिन केंद्र के फंड का इंतजार किए बिना राज्य सरकार अपने खजाने से तुरंत मदद शुरू करेगी।

फिलहाल राज्य में किसी भी जिले को आधिकारिक तौर पर पूरी तरह सुखाग्रस्त घोषित नहीं किया गया है, लेकिन कृषि मंत्री दत्तात्रय भरणे ने अलग-अलग इलाकों का दौरा कर हालात का जायजा लिया है। ई-पंचनामे की प्रक्रिया तेजी से चल रही है और 30 सितंबर के बाद अंतिम जानकारी इकट्ठा की जाएगी।

5 अक्टूबर तक मदद और पुनर्वास विभाग की रिपोर्ट साफ होने पर केंद्र सरकार को भेजा जाने वाला प्रस्ताव और राज्य में मदद कार्य की अंतिम रूपरेखा तय की जाएगी। इस प्रस्ताव में 25 फीसदी फसल बीमा एडवांस, शिक्षा शुल्क माफी, हॉस्टल अनुदान और मनरेगा के कामों में तेजी जैसे कदम शामिल होंगे। कागज पर दर्ज आंकड़े और सरकारी बैठकों से ज्यादा जरूरी अब यह है कि किसान के हाथ में सीधे और वक्त पर मदद पहुंचे। 5 अक्टूबर को सरकार क्या ठोस फैसला लेती है, इस पर पूरे महाराष्ट्र की नजर टिकी है।

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