दिवाली से पहले 5,000 रुपये की मदद पर कागज़ात की शर्तें, किसानों ने शर्तें हटाने की मांग की
सूखे से जूझ रहे किसान मुख्यमंत्री की सहायता घोषणा का स्वागत करते हैं, पर पंचनामे और सहमति पत्र जैसी शर्तें हटाने की मांग कर रहे हैं।
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उंब्रज: राज्य के सूखे से प्रभावित किसानों को दिवाली से पहले बिना भेदभाव पांच हजार रुपये की मदद देने की घोषणा मुख्यमंत्री ने की थी। कम ज़मीन वाले किसानों ने इस घोषणा का स्वागत किया है। लेकिन मदद लेने के लिए फसल पंचनामा समेत कई कागज़ात जमा करने की शर्तें सामने आई हैं और इससे किसानों में काफी नाराज़गी है। किसान सवाल उठा रहे हैं कि सरकार एक तरफ मदद का एलान करे और दूसरी तरफ कागज़ों की जटिल प्रक्रिया थोप दे, यह कैसा न्याय है। उनकी मांग है कि पंचनामा और कागज़ात की झंझट बंद करके घोषित रकम बिना शर्त सीधे बैंक खाते में जमा की जाए।
इस साल राज्य के कई हिस्सों में बारिश ने दगा दिया, जिससे खरीफ सीज़न को बड़ा झटका लगा है। किसानों ने कर्ज़ लेकर बीज, खाद, दवाइयों और खेत की तैयारी पर खर्च किया था, लेकिन बारिश न होने से हाथ में आई फसल सूख गई। इससे उन्हें भारी आर्थिक नुकसान हुआ है। अब सवाल है कि कर्ज़ कैसे चुकाएं और परिवार का गुज़ारा कैसे चलाएं।
राज्य के मुख्यमंत्री और अलग-अलग विभागों के मंत्रियों ने खेतों की मेड़ पर जाकर फसलों का जायज़ा लिया था। किसानों की तकलीफ जानने के बाद सरकार ने पहले चरण में 265 और दूसरे चरण में 40, यानी कुल 305 तालुकों में सूखा घोषित किया। मगर किसान और विपक्षी पार्टियां पूछ रही हैं कि जब कई इलाकों में बारिश न होने से खेती का नुकसान हुआ, तो सूखा घोषित करने के लिए चरणों में बंटवारा किस आधार पर किया गया। पहले चरण के तालुकों के लिए कौन से मानदंड लगे, और कुछ ही दिनों बाद 40 और तालुके जोड़ते समय कौन से मापदंड इस्तेमाल हुए, यह भी पूछा जा रहा है। बाकी तालुकों में सूखे की हालत का आकलन कब और कैसे होगा, इन सवालों के जवाब किसानों को अब तक नहीं मिले हैं, ऐसी उनकी भावना है।
दशहरा और दिवाली जैसे बड़े त्योहार करीब हैं और किसानों के पास कमाई का कोई साधन नहीं बचा है। ऐसे में दिवाली से पहले पांच हजार रुपये की मदद के एलान से उन्हें कुछ राहत मिली थी। लेकिन फिर शर्तें सामने आईं: फसल पंचनामा, सातबारा की नकल, फसल की फोटो, हिस्सेदारों का सहमति पत्र, बैंक पासबुक, आधार कार्ड और बाकी कागज़ात जमा करने होंगे। इससे किसान निराश हैं।
खासकर जिन खेतों की सातबारा की नकल पर कई हिस्सेदारों के नाम हैं, वहां सहमति पत्र लेना अक्सर मुश्किल होता है। सवाल उठ रहा है कि अगर कोई हिस्सेदार सहमति न दे, तो क्या वह किसान मदद से वंचित रह जाएगा। प्राकृतिक आपदा से पहले ही आर्थिक संकट में फंसे किसानों को मदद के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़े, तो इस मदद का असली मकसद ही बेकार हो जाने का डर जताया जा रहा है।
किसानों का कहना है कि प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि और नमो शेतकरी महासन्मान निधि योजनाओं के लाभार्थी किसानों की जानकारी और उनके बैंक खातों का ब्योरा सरकार के पास पहले से मौजूद है। इसलिए उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड से पात्र लाभार्थियों की जांच करके रकम सीधे खाते में डाली जा सकती है। उनका कहना है कि सरकार को सचमुच संकट में फंसे किसानों की मदद करनी है, तो कागज़ात की शर्तों में उलझाने के बजाय प्रक्रिया आसान करे। कुछ किसान गुस्से में यह भी पूछ रहे हैं कि क्या मदद देने की इच्छा न होने के कारण ही कागज़ों की झंझट बढ़ाई जा रही है।
सूखे से किसानों का आर्थिक गणित पूरी तरह बिगड़ गया है। त्योहारों के मौसम में घर का खर्च, बच्चों की पढ़ाई, दवा-इलाज और कर्ज़ की किस्तें भरना भी मुश्किल हो गया है। पांच हजार रुपये की रकम भले छोटी हो, पर संकट में किसानों के लिए अहम हो सकती है। इसलिए मांग जोर पकड़ रही है कि सरकार घोषित मदद की कड़ी शर्तों पर फिर से विचार करे और पात्र किसानों को बिना शर्त, या कम से कम ज़रूरी कागज़ात पर, मदद दे। पीएम किसान और नमो शेतकरी योजनाओं के लाभार्थियों समेत सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज पात्र किसानों के खाते में पांच हजार रुपये तुरंत जमा करने की मांग हो रही है। किसान वर्ग की अपेक्षा है कि सरकार घोषणा करके सिर्फ उम्मीद जगाने के बजाय समय पर अमल करे और अपना दिया वचन निभाए।
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