सोम‌वार, 19 अक्टूबर 2026

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06:57 IST

खुले मसालों की बिक्री पर रोक से छोटे विक्रेता और गरीब ग्राहक परेशान

अन्न व औषध प्रशासन के आयुक्त तुकाराम मुंढे के फैसले का असर दिहाड़ी मजदूरों, आम ग्राहकों और छोटे मसाला विक्रेताओं पर पड़ रहा है।

खुले मसालों की बिक्री पर रोक से छोटे विक्रेता और गरीब ग्राहक परेशान तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

महाराष्ट्र में खुले यानी छुट्टे मसालों की बिक्री पर पाबंदी का मामला गरमा गया है। अन्न और औषध प्रशासन के आयुक्त तुकाराम मुंढे ने खुले मसालों की बिक्री पर रोक लगाने का फैसला लिया है। इस फैसले का असर दिहाड़ी पर काम करने वाले मजदूरों, आम ग्राहकों और छोटे मसाला विक्रेताओं पर पड़ रहा है।

पैकिंग वाले मसाले महंगे होते हैं। इसी वजह से कई गरीब और आम ग्राहक खुले मसाले खरीदना पसंद करते हैं। दिहाड़ी मजदूर और कम आमदनी वाले ग्राहक अपनी जरूरत के हिसाब से 10 से 50 रुपये तक के खुले मसाले खरीदते दिखते हैं।

अन्न और औषध प्रशासन की तरफ से खुले मसालों की बिक्री पर बंदी लागू हुई, तो इसकी आर्थिक मार आम ग्राहकों पर तो पड़ेगी ही, सड़क किनारे और फुटपाथ पर मसाले बेचने वाले छोटे विक्रेताओं पर भी पड़ने की आशंका है।

मसाला विक्रेताओं का कहना है कि पैकिंग मसाले महंगे होने की वजह से आम गरीब ग्राहकों के बजट में वे नहीं बैठते। इसलिए खुले मसालों की बिक्री पर पाबंदी लगाते वक्त ग्राहकों की आर्थिक हालत और छोटे विक्रेताओं के धंधे का भी ख्याल रखा जाना चाहिए, यह उनका रुख है।

दिहाड़ी मजदूर और कम आमदनी वाले ग्राहक 10 से 50 रुपये तक के खुले मसाले खरीदते हैं। पैकिंग वाले मसाले लेने पड़े, तो उन पर आर्थिक बोझ बढ़ता है। सड़क किनारे और फुटपाथ पर छोटे स्तर पर खुले मसालों का धंधा करने वालों की रोजी-रोटी पर भी असर दिख रहा है। छोटे व्यापारियों और विक्रेताओं में यह सुर है कि बाजार में मंदी है और पैकिंग मसाले आम ग्राहकों की पहुंच से बाहर हैं, ऐसे में यह फैसला सिर्फ बड़ी ब्रांडेड कंपनियों को फायदा पहुंचाने वाला है।

मसाला व्यापारियों का कहना है कि इससे नुकसान उनका हो रहा है। जो मसाले बाजार में महंगे हैं, वही वे सस्ते दाम पर बेच रहे हैं। जो खरीदार आते हैं, वे 10 से 20 रुपये के मसाले खरीदते हैं। कुछ मसाले हजार रुपये किलो के भाव से बिकते हैं। बाजार में मंदी होने से ग्राहक कम हैं।

व्यापारियों की प्रतिक्रिया है कि आम जनता के लिए यह फैसला गलत है। उनका सवाल है कि आम जनता कैसे खरीदेगी। उनके मुताबिक पैकिंग मसाले ही चलाने का मतलब बड़ी कंपनियों को और बड़ा करना है।

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