गोकुळ चुनाव में सतेज पाटील का गठबंधन जीता, तीन पूर्व अध्यक्ष और नविद मुश्रीफ हारे
कोल्हापुर जिला सहकारी दूध उत्पादक संघ यानी गोकुल के चुनाव नतीजे आ गए हैं। विधायक सतेज पाटील की अगुवाई वाले गठबंधन ने महायुती को हराया।
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कोल्हापुर जिला सहकारी दूध उत्पादक संघ, यानी गोकुल, के चुनाव के नतीजे अभी घोषित हुए हैं। कोल्हापुर की राजनीति और समाज में गोकुल को संस्थागत ताकत का केंद्र माना जाता है। विधायक सतेज पाटील की अगुवाई वाली 'राजर्षी शाहू शेतकरी समविचारी आघाड़ी' ने इस चुनाव में महायुती को हरा दिया और गोकुल पर अपना दबदबा साबित किया। कहा जा रहा है कि इन नतीजों ने सिर्फ कोल्हापुर के सहकार क्षेत्र को ही नहीं, पूरे महाराष्ट्र की राजनीति को एक बड़ा संदेश दिया है।
इस चुनाव में महायुती की तरफ से तीन मंत्री, दर्जन भर विधायक और मौजूदा व पूर्व सांसदों की पूरी ताकत मैदान में थी। ऐसे हालात में सतेज पाटील ने अकेले, लेकिन बहुत सोच-समझकर योजना बनाकर मुकाबला किया। बीते करीब महीने-डेढ़ महीने से वे गांव-गांव की दूध उत्पादक संस्थाओं के संचालकों से सीधे संपर्क में थे। महायुती की ओर से भावनात्मक अपीलें और शपथ की राजनीति हुई, मगर पाटील ने संस्थाओं में पारदर्शिता और दूध उत्पादकों के हित का मुद्दा थामे रखा। इसी वजह से कोल्हापुर के सहकार क्षेत्र में उन्हें एक बार फिर 'जायंट किलर' के तौर पर मान्यता मिली है।
नतीजों में सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि सहकार क्षेत्र के पुराने और अनुभवी नेता हार गए। गोकुल के पूर्व अध्यक्ष अरुण डोंगले और विश्वास पाटील को मतदाताओं ने नकार दिया। चिकित्सा शिक्षा मंत्री हसन मुश्रीफ के बेटे नविद मुश्रीफ भी हार गए। इस हार को महायुती के लिए, और खास तौर पर मुश्रीफ गुट के लिए, बहुत बड़ा झटका माना जा रहा है। महायुती की प्रमुख और बेहद आक्रामक चेहरा मानी जाने वाली शौमिका महाडिक बहुत कम अंतर से हारीं, जिससे महायुती के खेमे में हलचल मच गई है।
मतदान भी रिकॉर्ड रहा। कुल 5,416 पात्र मतदाताओं में से 5,414 ने वोट डाला, यानी सिर्फ दो मतदाता वोट नहीं दे सके। मतदान का यह प्रतिशत 99.96 रहा। यह आंकड़ा बताता है कि यह चुनाव सिर्फ संचालक चुनने का नहीं था, बल्कि कोल्हापुर की अस्मिता और सत्ता के दबदबे की आर-पार की लड़ाई बन गया था।
प्रचार के दौरान मतदाताओं को लुभाने के लिए सैर-सपाटे, धार्मिक शपथ और बालूमामा या यल्लमा देवी के नाम पर धमकी देने के आरोप-प्रत्यारोप हुए थे। नतीजों से साफ हुआ है कि गांव के समझदार मतदाताओं ने अंधविश्वास और दबाव की राजनीति को पूरी तरह नकार दिया। सीधे संस्था चलाने वालों और किसानों ने दूध संघ के आर्थिक हित और सतेज पाटील के कामकाज पर भरोसा जताया।
गोकुल कोल्हापुर की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। इस संस्था का सालाना कारोबार करोड़ों रुपये का है, और इस पर पकड़ का मतलब सीधे ग्रामीण मतदाताओं से संपर्क है। सत्ता का पूरा हाथ होने के बावजूद हुई यह हार महायुती के भीतर की गुटबाजी और तालमेल की कमी को उजागर करती है, इसलिए उसे आत्मनिरीक्षण की जरूरत है।
इस जीत से महाविकास अघाड़ी को, और खास तौर पर सतेज पाटील गुट को, बड़ा राजनीतिक ऑक्सीजन मिला है। आने वाले स्थानीय स्वशासन संस्थाओं और विधानसभा चुनावों में इसका असर साफ दिखेगा। कुल मिलाकर गोकुल दूध संघ का 2026 का यह नतीजा सिर्फ एक चुनाव का फैसला नहीं, बल्कि कोल्हापुर के सहकार क्षेत्र में नए दौर की शुरुआत है। सतेज पाटील ने अपनी राजनीतिक कूटनीति के दम पर महायुती का गढ़ भेद दिखाया है।