विधान परिषद नतीजों के बाद महायुति में खटपट, शिंदे ने नेताओं से कहा, दोस्ती में कुश्ती नहीं
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विधान परिषद की 5 सीटों में महायुति को सिर्फ 2 मिलीं, महाविकास आघाडी को 3। भाजपा और शिंदे गुट के बीच तनाव बढ़ा तो उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने अपने नेताओं को संयम की सलाह दी।
विधान परिषद चुनाव के नतीजे आने के बाद महायुति के अंदर खटपट शुरू हो गई है। पांच सीटों में से महायुति सिर्फ 2 सीटें जीत पाई, जबकि महाविकास अघाड़ी ने 3 सीटों पर बड़ी जीत दर्ज की। इस नतीजे के बाद भाजपा और शिंदे गुट के बीच तनाव काफी बढ़ गया है।
भाजपा के नेताओं ने आरोप लगाया है कि इस चुनाव में हार शिंदे सेना की वजह से हुई। इसके बाद शिंदे गुट और भाजपा के नेता एक-दूसरे पर तीखे आरोप-प्रत्यारोप करते दिख रहे हैं।
इसी माहौल में उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने अपने नेताओं और पदाधिकारियों को अहम निर्देश दिए हैं। गुरुवार को हुई बैठक में उपमुख्यमंत्री ने नेताओं से कहा कि "दोस्ती में कुश्ती नहीं होनी चाहिए"। उन्होंने पार्टी के नेताओं और पदाधिकारियों को सहयोगी दलों के साथ तालमेल से चलने की सलाह दी। शिवसेना के नेताओं को शिंदे ने निर्देश दिया है कि नतीजों के बाद महायुति में पैदा हुआ विवाद आगे न बढ़ाएं।
शिंदे ने पदाधिकारियों से कहा कि महायुति के तौर पर इन नतीजों पर आत्मचिंतन करना चाहिए और ध्यान रखना चाहिए कि गलतियां दोबारा न हों। उनका कहना था कि गठबंधन में नाराजगी न आए और आपसी विवाद का फायदा विरोधियों को न मिले, इसकी सावधानी खुद हमें ही रखनी है।
एकनाथ शिंदे ने स्थानीय पदाधिकारियों से एक विस्तृत रिपोर्ट भी मांगी है। इसमें यह बताना है कि महायुति के तौर पर काम करते हुए इस चुनाव में कौन-सी गलतियां हुईं और कहां कमियां रह गईं। शिंदे ने साफ किया कि महायुति की समन्वय समिति की बैठक में और वरिष्ठ नेताओं की बैठक में इस पर विस्तार से चर्चा की जाएगी।
फिलहाल शिंदे ने पार्टी के प्रवक्ताओं और पदाधिकारियों से कहा है कि मीडिया से बात करते समय सहयोगी दल की आलोचना न करें, आपसी मतभेद से बचें और एकजुट होकर फिर से काम में लग जाएं।
नवनाथ बन की बताई जा रही सोशल मीडिया पोस्ट में शिवसेना पर कई बातें कही गई हैं। पोस्ट के मुताबिक शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के चुनाव में पुणे और नागपुर में सहयोगी दल शिवसेना ने उम्मीद के मुताबिक सहयोग नहीं किया। पोस्ट में कहा गया है कि पुणे में ऐन वक्त पर सचिन सानप को समर्थन देकर शिवसेना ने महायुति की एकजुटता को झटका दिया, और उन्हें मिले वोट स्नातक चुनाव में भाजपा को नहीं मिले।
पोस्ट में यह भी कहा गया है कि छत्रपति संभाजीनगर में अब्दुल सत्तार ने सीधे राष्ट्रवादी कांग्रेस के खिलाफ प्रचार किया, जिसका भी नुकसान हुआ। पोस्ट के अनुसार अगर शिवसेना महायुति का धर्म निभाकर भाजपा और राष्ट्रवादी कांग्रेस का साथ देती, तो पांचों सीटों पर महायुति की जीत होती। इसमें कहा गया है कि पुणे की एक सीट के लालच में शिवसेना ने सहयोगियों को मुश्किल में डाला और तीन सीटों पर जीत का मौका गंवा दिया, और एक सीट के लिए सहयोगियों का नुकसान करने का रुख महायुति के हित में नहीं है।
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