शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026

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नागपुर ग्रेजुएट सीट पर बीजेपी हारी: निर्दलीय अनिल सोले और 15,000 से ज्यादा अवैध वोट पर सवाल

नागपुर ग्रेजुएट सीट पर बीजेपी हारी: निर्दलीय अनिल सोले और 15,000 से ज्यादा अवैध वोट पर सवाल तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
सियासत PT24 टीम

कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने बीजेपी के सुधाकर कोहले को 3,271 वोट से हराया। टिकट कटने पर निर्दलीय उतरे अनिल सोले और अवैध वोटों को लेकर पार्टी के अंदर सवाल उठ रहे हैं।

नागपुर ग्रेजुएट्स constituency में बीजेपी की हार अब सिर्फ एक चुनावी झटका नहीं रही। उम्मीदवार के चयन, पार्टी के अंदर की नाराजगी और अपने ही गढ़ को संभाल न पाने को लेकर सवाल उठने लगे हैं। विवाद के केंद्र में पूर्व MLC अनिल सोले हैं, जिन्हें केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का करीबी बताया गया है। बीजेपी का टिकट नहीं मिला तो वे निर्दलीय उम्मीदवार बन गए।

नतीजे में कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की। उन्होंने बीजेपी के उम्मीदवार सुधाकर कोहले को 3,271 वोट से हराया। यह हार बीजेपी के लिए खास तौर पर शर्मिंदगी भरी है, क्योंकि नागपुर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय मंत्री गडकरी का गृहनगर है और पार्टी के सबसे पुराने मजबूत इलाकों में गिना जाता है।

अनिल सोले को नजरअंदाज करने के बीजेपी के फैसले पर एक बार फिर बात हो रही है। टिकट कटने के बाद सोले निर्दलीय मैदान में उतरे, जिससे उम्मीदवार चयन को लेकर पार्टी के अंदर की नाराजगी सामने आ गई। बताया गया है कि मुख्यमंत्री फडणवीस खुद सोले के घर गए और मामला सुलझाने की कोशिश की, इसके बाद सोले ने प्रचार रोका। लेकिन यह दखल देर से हुआ या नहीं, इस पर राजनीतिक बहस जारी है। सोले की उम्मीदवारी से बीजेपी समर्थकों के वोट कितने बंटे और कोहले की संभावना पर कितना असर पड़ा, यह अभी साबित नहीं हुआ है।

इस चुनाव में सबसे ज्यादा चर्चा अवैध वोटों की संख्या की है। 15,000 से ज्यादा वोट अवैध घोषित हुए। बताया गया है कि इनमें करीब 9,000 बैलेट ऐसे थे जिनमें कोहले के आगे पसंद नंबर 2 लिखा गया था, लेकिन बाकी 37 उम्मीदवारों के लिए आगे की पसंद नहीं दी गई। इससे मतदाताओं की जागरूकता, पसंद वाले बैलेट के संचालन और बीजेपी के उम्मीदवार को लेकर कुछ मतदाताओं की संभावित नाराजगी पर सवाल उठे हैं। हालांकि सिर्फ वोट के इस पैटर्न से यह तय नहीं किया जा सकता कि ये बैलेट किस वजह से अवैध हुए।

कोहले ने संकेत दिया है कि वे अवैध वोटों के खिलाफ अपील करेंगे। इस अपील से मतगणना की प्रक्रिया और इतने बैलेट रद्द होने की वजहों की और जांच हो सकती है।

बीजेपी के लिए इस सीट का इतिहास भी मायने रखता है। गडकरी खुद 1990 से 2014 तक नागपुर ग्रेजुएट्स constituency का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। लगातार दूसरी बार यह सीट हारना बताता है कि पढ़े-लिखे मतदाताओं में असर बनाए रखना पार्टी के लिए मुश्किल रहा है।

बीजेपी के चुनाव प्रचार की जिम्मेदारी संभालने वाले चंद्रशेखर बावनकुले ने हार की जिम्मेदारी ली और सुधार के कदम उठाने का वादा किया। उन्होंने कहा कि पार्टी अगले चुनाव में यह सीट वापस लेने के लिए काम करेगी। उन्होंने यह भी कहा कि जिन लोगों ने पार्टी की संभावनाओं को नुकसान पहुंचाया, उनकी पहचान की जाएगी और कार्रवाई होगी। इससे लगता है कि पार्टी के अंदर जवाबदेही तय हो सकती है।

बीजेपी की परेशानी सिर्फ नागपुर तक सीमित नहीं रही। पार्टी ने महाराष्ट्र में तीन सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन सिर्फ पुणे ग्रेजुएट्स सीट जीत पाई, जहां कौस्तुभ गवांडे ने शिवसेना के बागी सचिन सानप को हराया। सीट बंटवारे और उम्मीदवारों के चयन को लेकर सहयोगी दलों में पहले से तनातनी थी।

बीजेपी के एक पदाधिकारी ने आरोप लगाया कि पुणे टीचर्स constituency में शिवसेना कार्यकर्ताओं ने बीजेपी उम्मीदवार स्मिता जाधव के खिलाफ प्रचार किया, जिससे वे हारीं। बीजेपी का कहना है कि महायुति एकजुट होकर लड़ती तो पांचों सीटें सत्ताधारी गठबंधन को मिल सकती थीं।

शिवसेना ने यह दोष मानने से इनकार किया। पुणे इकाई के प्रमुख रवींद्र धंगेकर ने पलटकर कहा कि बीजेपी को अपने सहयोगी दलों को हल्के में लेना बंद करना चाहिए। उन्होंने चुनाव नतीजे को पार्टी के लिए हकीकत का आईना बताया।

छत्रपति संभाजीनगर ग्रेजुएट्स constituency में भी महायुति की दरार दिखी। NCP (शरदचंद्र पवार) के उम्मीदवार प्रतापसिंह पाटिल ने NCP के सतीश चव्हाण को हराया। शिवसेना के वरिष्ठ नेता अब्दुल सत्तार ने खुलकर माना कि उन्होंने अपने गठबंधन सहयोगी के बजाय शरद पवार गुट के उम्मीदवार का साथ दिया। उनका तर्क था कि NCP ने उम्मीदवार चुनने में गलती की। NCP पांचों सीटों में से कोई नहीं जीत सकी, और पार्टी प्रमुख सुनेत्रा पवार ने कहा कि हर चुनावी नतीजा कुछ न कुछ सबक देता है।

इसी बीच गुरुवार को मुंबई में मुख्यमंत्री फडणवीस एक सार्वजनिक मंच पर शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे और MNS अध्यक्ष राज ठाकरे के साथ दिखे। इसे लेकर चल रही अटकलों को खारिज करते हुए फडणवीस ने कहा कि ऐसी मुलाकातें महाराष्ट्र की राजनीतिक परंपरा का हिस्सा हैं।

फिर भी नागपुर के नतीजों ने बीजेपी के सामने घर में ही एक ज्यादा फौरी समस्या खड़ी कर दी है। आधिकारिक उम्मीदवार की हार, गडकरी के करीबी अनिल सोले का किनारे होना, 15,000 से ज्यादा अवैध वोटों का विवाद और सहयोगी दलों के उलटे काम करने के आरोप, सब मिलकर पार्टी के चुनावी प्रबंधन की कमजोरियां दिखाते हैं। जिस पार्टी के लिए नागपुर उसका किला है, उसके सामने अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि कोहले 3,271 वोट से क्यों हारे, बल्कि यह भी है कि क्या उम्मीदवार चयन से पैदा हुई नाराजगी को कम आंका गया और अपनी ही कतार के संकेत नहीं पढ़े गए।

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