नागपुर MLC चुनाव में निर्दलीय करले के वोटों से बढ़ा सस्पेंस, किंगमेकर बने
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
NCP (SP) से टिकट न मिलने पर निर्दलीय उतरे नितेश करले ने नागपुर संभाग स्नातक निर्वाचन क्षेत्र की गिनती को रोमांचक बना दिया। वंजारी अंत में जीते।
नागपुर संभाग स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव में सबसे ज्यादा चर्चा उस उम्मीदवार की रही, जिसे पार्टी ने टिकट नहीं दिया था। निर्दलीय उम्मीदवार नितेश करले को पहले टिकट से वंचित किया गया, फिर नाम वापस न लेने पर पार्टी से निकाल दिया गया और बड़े राजनीतिक खिलाड़ियों ने उन्हें गिनती में ही नहीं रखा था। इसके बावजूद उन्होंने BJP और कांग्रेस के सीधे मुकाबले को सांसें थाम देने वाले थ्रिलर में बदल दिया।
वर्धा के रहने वाले करले सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर से नेता बने हैं। शरद पवार की अगुवाई वाली NCP (SP) ने उन्हें टिकट देने से मना कर दिया था। वजह यह थी कि गठबंधन की व्यवस्था में यह सीट कांग्रेस को दे दी गई थी। करले ने फिर भी नामांकन वापस नहीं लिया, और इसके बाद उन्हें छह साल के लिए पार्टी से निकाल दिया गया।
नतीजा यह रहा कि करले को 25,000 से ज्यादा पहली पसंद के वोट मिले। जीत के लिए 75,438 वोटों का कोटा चाहिए था, लेकिन शुरुआत में न BJP उम्मीदवार सुधाकर कोहले इसे छू पाए और न कांग्रेस के अभिजीत वंजारी। ऐसे में करले को मिले वोट सबकी नजर में आ गए, क्योंकि उनकी दूसरी पसंद के वोट फैसला कर सकते थे।
मुकाबला BJP और कांग्रेस की सीधी टक्कर से शुरू हुआ था, पर जल्दी ही यह आंकड़ों, सब्र और सियासी हिसाब-किताब की लंबी लड़ाई बन गया। गिनती के हर दौर के साथ कोहले और वंजारी के बीच बढ़त बदलती रही और दोनों खेमे बेचैन रहे। करीब 40 घंटे की गिनती के बाद भी सस्पेंस बना रहा, क्योंकि पसंद के हिसाब से वोट गिनने की प्रक्रिया ने नतीजे को और पेचीदा कर दिया था।
करले का मैदान में उतरना शुरू में अपनी ही पार्टी के नेतृत्व को चुनौती जैसा दिखा था। किसी भी राष्ट्रीय पार्टी की मशीनरी के बिना भी वे अच्छी-खासी संख्या में पहली पसंद के वोट खींच लाए। कोहले और वंजारी दोनों को उस उम्मीदवार का हिसाब लगाना पड़ा, जिससे किसी ने नहीं सोचा था कि वह मुकाबले की दिशा तय करेगा।
सोशल मीडिया पर डाले गए वीडियो संदेश में करले ने कहा कि उनका समर्थन सीधे लोगों से जुड़कर बना है, पारंपरिक चुनाव प्रचार से नहीं। उन्होंने कहा, "मैंने लोगों का यह समर्थन किसी स्थापित पार्टी के सहारे के बिना बनाया। मैंने पैसे नहीं बांटे, न शराब या मीट की पार्टियां कीं। प्रचार में बैनर तक नहीं लगाए। यह इसलिए हो रहा है क्योंकि लोगों ने मुझ पर भरोसा किया।"
करले ने यह भी आरोप लगाया कि उनके पक्ष में पड़े करीब 8,000 बैलट रद्द कर दिए गए, क्योंकि कुछ मतदाताओं ने उनके नाम के आगे "21" लिख दिया था या बैलट पर गलत निशान लगाया था। यह दावा सही साबित हो तो उनके समर्थन का वजन और बढ़ेगा, लेकिन इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी होगी।
करले ने अपने प्रदर्शन का श्रेय आंदोलनों और जनता के मुद्दों पर सीधे दखल को दिया। उनका कहना है कि उनकी राजनीति सिर्फ भाषणों और प्रचार पर नहीं, बल्कि जमीन पर लोगों के सवाल उठाने पर टिकी है।
गिनती की शुरुआत में 75,438 का कोटा दोनों प्रमुख उम्मीदवारों के लिए बड़ी बाधा साबित हुआ। पसंद के आधार पर वोट गिनने की व्यवस्था में उम्मीदवार बाहर होते जाते हैं और उनकी दूसरी पसंद के जायज वोट आगे ट्रांसफर होते हैं, जिससे हर बैलट अहम हो सकता है। इसी वजह से करले के वोटों की अहमियत उनकी अपनी जीत की संभावना से कहीं ज्यादा हो गई। BJP और कांग्रेस दोनों को ट्रांसफर पर बारीकी से नजर रखनी पड़ी, इस उम्मीद में कि अगले दौर में पलड़ा उनकी तरफ झुकेगा।
दो बड़ी पार्टियों के दबदबे वाले मुकाबले में अपनी ही पार्टी से टिकट न पाने वाला उम्मीदवार अचानक किंगमेकर बन गया। आखिर में वंजारी जीते, लेकिन करले का दमदार प्रदर्शन इस चुनाव की सबसे खास बातों में रहा। टिकट के दावेदार से गिनती में निर्णायक कारक बनने तक का उनका सफर याद दिलाता है कि चुनावी असर हमेशा पार्टी के झंडे, संगठन की ताकत या पारंपरिक प्रचार साधनों से तय नहीं होता।
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