नागपुर, पटना और वाराणसी के MLC नतीजों में भाजपा को कहीं झटका, कहीं सपा की जीत
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महाराष्ट्र, बिहार और उत्तर प्रदेश के विधान परिषद चुनावों में स्थापित दलों के उम्मीदवारों को चुनौती मिली।
महाराष्ट्र, बिहार और उत्तर प्रदेश में हाल ही में हुए विधान परिषद (MLC) चुनावों के नतीजों के बाद राजनीतिक गलियारों में कई सवाल उठ रहे हैं। कुछ सीटों पर स्थापित दलों के उम्मीदवारों को चुनौती का सामना करना पड़ा। इन नतीजों को किसी राष्ट्रीय नेता की निजी हार कहना ठीक नहीं होगा, लेकिन एक अहम सवाल जरूर खड़ा होता है कि राष्ट्रीय राजनीति में मजबूत पार्टियां क्या अलग-अलग स्थानीय और पेशेवर मतदाता समूहों के बीच भी उतनी ही असरदार हैं।
सबसे ज्यादा चर्चा नागपुर विभाग स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के मुकाबले की रही। कांग्रेस के मौजूदा विधान परिषद सदस्य अभिजीत वंजारी ने भाजपा उम्मीदवार सुधाकर कोहळे को 3,271 वोटों से हराकर अपनी सीट बचा ली। वंजारी को 67,231 वोट मिले और कोहळे को 63,960। निर्दलीय उम्मीदवार नितेश कराले को 24,249 वोट मिले। मतगणना 40 घंटे से ज्यादा चली। दूसरे दौर में पहली पसंद के वोटों की गिनती के बाद कोहळे 4,294 वोटों से आगे थे, मगर वरीयता क्रम के वोटों की गिनती के बाद अंतिम नतीजा बदल गया।
नागपुर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का गृह शहर है। गडकरी लंबे समय तक इसी स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से विधान परिषद में रहे हैं। दोनों नेताओं ने भाजपा उम्मीदवार के लिए प्रचार भी किया था। फिर भी इस चुनाव में न फडणवीस उम्मीदवार थे, न गडकरी, इसलिए इसे उनकी निजी हार कहना तथ्यों के हिसाब से गलत होगा। इसे नागपुर में पुरानी पकड़ वापस पाने की भाजपा की कोशिश को लगे झटके के रूप में देखा जा सकता है। कराले को मिले वोटों से मुकाबले पर असर पड़ा, पर कितना, यह समझने के लिए वरीयता वोटों के हस्तांतरण और गिनती के हर चरण को देखना होगा।
बिहार की पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र सीट पर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के उम्मीदवार डॉ. संजीव कुमार सिंह ने भाजपा के वरिष्ठ नेता नवल किशोर यादव को हरा दिया। सिंह को 4,487 वोट मिले और यादव को 3,430, यानी जीत का अंतर 1,057 वोट रहा। नवल किशोर यादव करीब तीन दशक से इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। यह भाजपा के लिए बड़ा राजनीतिक झटका है। अब सवाल है कि क्या शिक्षकों के स्थानीय मुद्दे निर्णायक रहे, क्या मौजूदा प्रतिनिधि से नाराजगी थी, या राजद का संगठन और उम्मीदवार का निजी संपर्क ज्यादा काम आया। इसका पक्का जवाब मुद्दों, मतदाताओं की प्रतिक्रिया और प्रचार के दौरान उठे सवालों के विस्तृत अध्ययन से ही मिलेगा। पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में नतीजा अलग रहा, जहां जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के नेता नीरज कुमार ने सीट बरकरार रखी।
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के लाल बिहारी यादव ने वाराणसी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में जीत दर्ज की। वाराणसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लोकसभा क्षेत्र है, इसलिए नतीजे पर ध्यान गया। लेकिन मोदी इस MLC चुनाव में उम्मीदवार नहीं थे, और यह चुनाव लोकसभा चुनाव से अलग है, इसके मतदाता भी अलग हैं। इसलिए यह कहना गलत होगा कि मोदी वाराणसी में हार गए। हां, नतीजा बताता है कि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का असर हर स्थानीय या पेशेवर निर्वाचन क्षेत्र में जीत पक्की नहीं करता।
लखनऊ में एक ही शहर में दो अलग नतीजे आए। भाजपा के उमेश द्विवेदी ने शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की सीट बचाई, जबकि समाजवादी पार्टी की कांति सिंह ने स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में जीत हासिल की। लखनऊ रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का लोकसभा क्षेत्र है, पर वे इन दोनों चुनावों में उम्मीदवार नहीं थे, इसलिए उनके हारने की बात कहना गलत होगा।
इन नतीजों से तीन सवाल निकलते हैं। पहला, राष्ट्रीय लोकप्रियता क्या स्थानीय चुनावों में वोट बनती है। लोकसभा में किसी पार्टी का प्रदर्शन शिक्षक या स्नातक जैसे खास मतदाता समूहों में उसकी जीत की गारंटी नहीं है। इन चुनावों में मतदाता उम्मीदवार की उपलब्धता, स्थानीय समस्याओं, पेशेवर हितों और निजी संपर्क को ज्यादा अहमियत दे सकते हैं। दूसरा, उम्मीदवार का चयन कितना मायने रखता है। नागपुर और पटना दिखाते हैं कि पार्टी का समर्थन और लंबा अनुभव अपने आप जीत नहीं दिलाते, हालांकि सिर्फ नतीजों से यह तय नहीं हो सकता कि हार की वजह उम्मीदवार का चयन थी, स्थानीय नाराजगी थी या कुछ और। तीसरा, वरीयता क्रम के वोट कितने निर्णायक हैं। नागपुर में शुरुआती दौर में आगे रहने वाला उम्मीदवार आखिर में हार गया, इसलिए शुरुआती रुझानों पर नहीं, पूरी गिनती पर नजर रखना जरूरी है।
यह सवाल भी उठता है कि क्या इन चुनावों को मीडिया में उतनी जगह मिली जितनी इनके राजनीतिक महत्व के हिसाब से मिलनी चाहिए थी। इसका जवाब देने के लिए सुर्खियों की प्रमुखता, टीवी कवरेज की अवधि, अखबारों में जगह और विश्लेषण की गहराई की तथ्यात्मक तुलना करनी होगी।
कुल मिलाकर नागपुर, पटना और वाराणसी के नतीजे स्थानीय राजनीति की अहमियत दिखाते हैं। राजनीतिक असर हर निर्वाचन क्षेत्र में एक जैसा नहीं होता और अलग मतदाता समूह राष्ट्रीय चुनावों से अलग फैसला कर सकते हैं। फिर भी इनके आधार पर यह कहना जल्दबाजी होगी कि देश या किसी पूरे राज्य में बदलाव की लहर चल रही है। असली अहमियत उम्मीदवारों के चयन, स्थानीय संपर्क, मतदाताओं की अपेक्षाओं और दलों की जमीनी पकड़ को समझने में है।
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