सुप्रीम कोर्ट ने कहा, बदले हुए फॉर्म-6 पर कोई फैसला नहीं दिया, चुनाव आयोग का दावा गलत
सोमवार की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि बदले हुए फॉर्म-6 को उसने मंजूरी नहीं दी है।
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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को साफ कहा कि नई वोटर रजिस्ट्रेशन के लिए भारत निर्वाचन आयोग यानी चुनाव आयोग (ECI) ने फॉर्म-6 में जो घोषणापत्र बदला है, उसे कोर्ट ने मंजूरी नहीं दी है। खंडपीठ ने यह भी बताया कि बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरावलोकन (SIR) के मामले में जब फैसला सुनाया गया था, तब यह बदला हुआ फॉर्म कोर्ट के सामने था ही नहीं। इसके बाद बदले हुए फॉर्म-6 को सुप्रीम कोर्ट की मान्यता मिलने के दावे पर नए सिरे से बहस छिड़ गई है।
यह बात एक नई याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आई। सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की खंडपीठ कर रही थी। याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज और फॉर्म-6 में किए गए बदलावों पर चिंता जताई गई थी।
याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट को बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने बदले हुए फॉर्म-6 को मंजूरी नहीं दी है, जबकि चुनाव आयोग ने दावा किया था कि बदले हुए घोषणापत्र पर कोर्ट की मुहर लगी है। इस पर न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने नए फॉर्म-6 पर कोई फैसला दिया ही नहीं है। बिहार के SIR मामले में जब फैसला आया, तब यह बदला हुआ फॉर्म अस्तित्व में ही नहीं था। उन्होंने यह भी कहा कि कोर्ट की पहले की मौखिक टिप्पणियों का मतलब यह नहीं निकाला जा सकता कि बदले हुए घोषणापत्र को मंजूर किया गया या खारिज कर दिया गया।
इसी बीच मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने खबरों के लिए कोर्ट की टिप्पणियों का अपने हिसाब से मतलब निकालने को लेकर आगाह किया। उन्होंने कहा कि कोर्ट की बातों के सही संदर्भ का ध्यान रखा जाए।
अब सवाल यह है कि फॉर्म-6 में बदलाव आखिर क्या है। नई वोटर रजिस्ट्रेशन में इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 के सुधारे हुए घोषणापत्र के मुताबिक आवेदक को बताना पड़ता है कि उसका अपना या उसके माता-पिता का नाम पिछले विशेष गहन मतदाता सूची पुनरावलोकन (SIR) में शामिल था या नहीं। दूसरे राज्यों में SIR के दौरान इस्तेमाल हुए फॉर्म-6 के पुराने रूप में ऐसी शर्त नहीं थी। इसलिए यह बदलाव किस प्रक्रिया से किया गया, इस पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
इन बदलावों को लेकर चुनाव आयोग की फैसला लेने की प्रक्रिया पर भी विवाद खड़ा हो गया है। दावा किया गया है कि दो चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति जताई थी। खबर है कि आपत्ति यह थी कि 'रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रुल्स, 1960' में केंद्र सरकार के संशोधन किए बिना घोषणापत्र में ऐसा बदलाव नहीं किया जा सकता।
26 सितंबर को चुनाव आयोग ने प्रेस नोट जारी कर दावा किया था कि बिहार SIR प्रक्रिया से जुड़े मई 2026 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में बदले हुए घोषणापत्र को सही ठहराया गया है। लेकिन सुधारा हुआ घोषणापत्र फैसले के बाद लाया गया था, इसलिए फैसला देते वक्त कोर्ट को उसका मजमून जांचने का मौका ही नहीं मिला। यह बात सोमवार की सुनवाई में साफ हो गई।
मामले पर सियासी विवाद भी तेज हो गया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने आरोप लगाया है कि भाजपा को फायदा पहुंचाने के लिए फॉर्म-6 में एकतरफा और गैरकानूनी तरीके से बदलाव किया गया। भाजपा ने ये आरोप खारिज किए हैं।
भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने इस फॉर्म को न गैरकानूनी ठहराया है और न ही खारिज किया है। उन्होंने इस दावे को भी नकार दिया कि कोर्ट ने इन बदलावों में किसी तरह की गैरकानूनी बात कही है।
कुल मिलाकर, बदले हुए फॉर्म-6 को सुप्रीम कोर्ट की मान्यता मिलने के दावे पर कोर्ट ने सफाई दे दी है, लेकिन इस घोषणापत्र के बदलावों की वैधता और उन्हें करने के लिए अपनाई गई प्रक्रिया को लेकर विवाद अब भी बना हुआ है।
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