रविवार, 11 अक्टूबर 2026

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15:51 IST

मेट्रो स्टेशन बंद करने पर सुप्रीम कोर्ट की अवमानना नोटिस, 13 अक्टूबर तक रिपोर्ट तलब

सीजेपी के आंदोलन के दौरान दिल्ली में मेट्रो स्टेशन बंद किए जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा है।

मेट्रो स्टेशन बंद करने पर सुप्रीम कोर्ट की अवमानना नोटिस, 13 अक्टूबर तक रिपोर्ट तलब तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

दिल्ली में सीजेपी के आंदोलन के दौरान मेट्रो स्टेशन बंद किए जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को अवमानना नोटिस जारी किया है। अदालत ने 9 अक्टूबर को दिए अपने आदेश के उल्लंघन का आरोप सामने आने पर अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगा है। साथ ही 13 अक्टूबर तक अनुपालन रिपोर्ट जमा करने को कहा गया है।

जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस व्ही. मोहना की बेंच ने रविवार को इस मामले में विशेष सुनवाई की। 'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) के आंदोलन के दौरान 10 अक्टूबर को मेट्रो स्टेशन क्यों बंद किए गए, इस पर अधिकारियों से जवाब तलब किया गया। रिपोर्ट में मेट्रो पर लगाई गई पाबंदियों और रेलवे प्रशासन की ओर से जारी हिदायतों का ब्योरा भी देना होगा।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और एसआईआर के खिलाफ जंतर मंतर पर चल रहे आंदोलन के मद्देनजर दिल्ली के कुल 45 मेट्रो स्टेशन बंद किए गए थे। इनमें से ज्यादातर स्टेशन मध्य दिल्ली और उसके आसपास के इलाकों में थे। स्टेशन बंद करने के साथ ही सीजेपी के प्रमुख नेताओं और विपक्षी दलों के सदस्यों को हिरासत में लेने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दाखिल हुई हैं।

वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन, दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार और दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन की अध्यक्ष डी. थारा के खिलाफ अवमानना याचिका दायर की थी। अदालत ने 9 अक्टूबर को आदेश दिया था कि आंदोलन से पहले सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को पूरी तरह बंद न किया जाए। याचिका में आरोप लगाया गया कि इसके बावजूद मेट्रो स्टेशन बंद रखे गए।

तृणमूल कांग्रेस की सांसद और वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने भी याचिका दाखिल की थी। इसमें आंदोलन के दौरान चार पूर्व मुख्यमंत्रियों समेत विपक्षी नेताओं और दूसरे नागरिकों को एहतियाती कार्रवाई के तहत हिरासत में लिए जाने पर आपत्ति जताई गई। सुनवाई के दौरान गुरुस्वामी ने दावा किया कि सात हजार से ज्यादा छात्र नेताओं, पत्रकारों और राजनीतिक हस्तियों को हिरासत में लिया गया। उन्होंने दलील दी कि शांतिपूर्ण आंदोलन के मूल अधिकार को दबाने के लिए एहतियाती नजरबंदी का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि मेट्रो सेवा और इंटरनेट पर पाबंदियों से लोगों की आवाजाही और अदालत तक पहुंचने के उनके अधिकार पर असर पड़ा। सुप्रीम कोर्ट के बाहर जमा करीब 150 वकीलों को हिरासत में लेने और कुछ पुलिसकर्मियों के बैज न लगाने का मुद्दा भी अदालत के सामने रखा गया।

इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि प्रशासन के पास ऐसे कागजात और वीडियो हैं, जिनसे पता चलता है कि कुछ लोगों को दोपहर करीब दो बजे हिरासत में लिया गया और शाम छह बजे तक छोड़ दिया गया।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मेट्रो और रेल सेवाएं सामान्य रूप से चालू रखने के निर्देश दिए। अदालत ने साफ किया कि सार्वजनिक व्यवस्था को खतरा होने पर जरूरी पाबंदियां लगाई जा सकती हैं, लेकिन लोगों की आवाजाही में बेवजह रुकावट नहीं डाली जानी चाहिए। बैरिकेड की जरूरत को भी तुरंत परखने को कहा गया।

अदालत ने इंटरनेट सेवा बिना रुकावट चालू रखने का निर्देश दिया और चेताया कि कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना किसी को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में न लिया जाए। सुप्रीम कोर्ट के बाहर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 163 के तहत पाबंदी लागू होने की बात लिखा बोर्ड हटाने का आदेश भी दिया गया।

अदालत ने कहा कि वकीलों को उनके पेशेवर काम में रोका न जाए। आंदोलनकारियों से अपील की गई कि वे आंदोलन शांतिपूर्ण रखें और दूसरों को न भड़काएं। प्रशासन ने भरोसा दिलाया कि मेट्रो और इंटरनेट सेवाएं सामान्य रूप से चलती रहेंगी, जिसे अदालत ने दर्ज किया।

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