रविवार, 11 अक्टूबर 2026

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16:29 IST

SIR के समर्थन में 124 पूर्व अफसरों का खुला पत्र, वोट चोरी के आरोपों पर उठाए सवाल

चुनाव आयोग और मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण पर छिड़े विवाद के बीच 124 पूर्व आईएएस, आईएफएस और दूसरे अफसरों ने आयोग के समर्थन में खुला पत्र जारी किया है।

SIR के समर्थन में 124 पूर्व अफसरों का खुला पत्र, वोट चोरी के आरोपों पर उठाए सवाल तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

नई दिल्ली: चुनाव आयोग और मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चल रहे विवाद के बीच 124 पूर्व आईएएस, आईएफएस और दूसरे अफसरों ने आयोग के समर्थन में एक खुला पत्र जारी किया है। पत्र में इन अफसरों ने वोट चोरी और चुनावी धोखाधड़ी के आरोपों पर सवाल खड़े किए हैं और कहा है कि ये आरोप भरोसेमंद सबूत के बिना लगाए जा रहे हैं।

पत्र में साफ कहा गया है कि नागरिकों को चुनाव प्रक्रिया पर सवाल पूछने का हक है। लेकिन जो लोग आरोप लगा रहे हैं, उन्हें उन्हें साबित करने की जिम्मेदारी भी उठानी होगी।

पूर्व अफसरों ने भारत की चुनाव व्यवस्था में आए बदलावों का ब्योरा भी रखा है। उनके मुताबिक देश की चुनाव प्रक्रिया अब बूथ कैप्चरिंग, फर्जी वोटिंग और चुनावी हिंसा के दौर से आगे निकल चुकी है। मौजूदा व्यवस्था में कई सुरक्षा इंतजाम शामिल हैं, जैसे मतदान केंद्रों पर राजनीतिक पार्टियों के एजेंट, ईवीएम की सीलिंग, स्ट्रॉन्ग रूम की सुरक्षा और वीवीपैट पर्चियों का मिलान।

पत्र में SIR प्रक्रिया के दौरान मिलने वाले सुरक्षा उपायों का भी जिक्र है। इनमें संबंधित लोगों को नोटिस देना, सुनवाई का मौका, अपील की व्यवस्था और राजनीतिक पार्टियों के बूथ स्तर के प्रतिनिधियों की हिस्सेदारी शामिल है।

सुप्रीम कोर्ट के रुख का हवाला देते हुए पूर्व अफसरों ने कहा कि अदालत ने इस प्रक्रिया की समीक्षा की और अतिरिक्त सुरक्षा इंतजाम तय किए। पत्र में यह दावा भी किया गया है कि अदालत ने SIR कराने के चुनाव आयोग के अधिकार को भी मान्यता दी है।

पूर्व अफसरों ने कहा है कि निष्पक्ष चुनाव के लिए मतदाता सूचियों का सही होना जरूरी है। बिहार का उदाहरण देते हुए पत्र में करीब 22 लाख मृत मतदाताओं और 7 लाख फर्जी पहचान पत्रों का जिक्र किया गया है। इसमें यह भी कहा गया है कि सूची में करीब 21.5 लाख नए मतदाताओं को जोड़ा जाएगा।

उनका कहना है कि मतदाता सूची में झूठी पहचान रखना चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता के लिए नुकसानदेह है। उनकी दलील है कि सूची के सही होने से असली मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा करने में मदद मिलती है।

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