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18:44 IST

शिवसेना चिन्ह मामला: कौल ने सुप्रीम कोर्ट में पार्टी संविधान पर उठाए सवाल

शिवसेना पार्टी और धनुष्यबाण चिन्ह पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में वकील नीरज किशन कौल ने चुनाव आयोग की टिप्पणियों का हवाला देकर पार्टी के भीतर लोकतंत्र का मुद्दा उठाया।

शिवसेना चिन्ह मामला: कौल ने सुप्रीम कोर्ट में पार्टी संविधान पर उठाए सवाल तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

शिवसेना पार्टी और धनुष्यबाण चिन्ह को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई में पार्टी के भीतर लोकतंत्र और पार्टी संविधान का मुद्दा जोरदार बहस का विषय रहा। वकील नीरज किशन कौल ने चुनाव आयोग की दर्ज की हुई टिप्पणियों का हवाला देते हुए शिवसेना की पार्टी संरचना और फैसले लेने के तरीके पर सवाल उठाए।

कौल की दलील के मुताबिक 1998 में ही शिवसेना को चिट्ठी भेजकर बताया गया था कि पार्टी में नियुक्तियां लोकतांत्रिक सिद्धांतों के हिसाब से नहीं हो रही हैं। शिवसेना की तरफ से उसका जवाब भी दिया गया था। कौल ने यह भी बताया कि चुनाव आयोग ने साफ किया था कि हर राजनीतिक पार्टी को अपने कामकाज का तरीका तय करके उसे पार्टी संविधान में लिखना जरूरी है।

शिवसेना में फूट के बाद चुनाव आयोग ने जो टिप्पणियां की थीं, उनका जिक्र करते हुए कौल ने पार्टी प्रमुख के अधिकारों का सवाल उठाया। उनके कहने के अनुसार, शिवसेना के कामकाज और पदाधिकारियों की नियुक्ति के तरीके को देखा जाए तो पार्टी प्रमुख को बड़े पैमाने पर अधिकार दिए गए थे। कौल ने बताया कि आयोग ने यह भी दर्ज किया था कि पार्टी प्रमुख और पार्टी एक ही सिक्के के दो पहलू बन गए थे।

कोर्ट में यह दलील भी दी गई कि 2018 के पार्टी संविधान के हिसाब से अलग-अलग पदाधिकारियों की नियुक्ति के अधिकार पार्टी प्रमुख के पास ही हैं। इसी वजह से यह सवाल खड़ा हुआ कि पार्टी के फैसलों में बाकी पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं की भूमिका कितनी थी।

कौल ने शिवसेना की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बनावट की तरफ भी कोर्ट का ध्यान खींचा। उन्होंने बताया कि कार्यकारिणी के सदस्यों को पार्टी के रोजमर्रा के कामकाज की जानकारी पार्टी प्रमुख को देनी होती है। शिवसेना की राष्ट्रीय कार्यकारिणी प्रतिनिधि सभा के सदस्य चुनते हैं। इस पर सवाल रखा गया कि क्या यह तरीका पार्टी के भीतर लोकतंत्र के नजरिए से सही है।

कौल के मुताबिक 2018 के पार्टी संविधान में राष्ट्रीय कार्यकारिणी के 13 सदस्य होने की बात है। लेकिन आखिरी पत्राचार में सिर्फ 9 सदस्यों के नाम दिए गए, ऐसा दावा किया गया। कौल ने कहा कि लाखों कार्यकर्ताओं वाली पार्टी में राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्यों की संख्या इतनी कम होना और उसके बारे में साफ जानकारी न मिलना पारदर्शिता का मुद्दा है, और चुनाव आयोग की टिप्पणियों से यही बात सामने आई।

सुनवाई में पार्टी संविधान से जुड़े दस्तावेजों का मुद्दा भी अहम रहा। कौल ने बताया कि जिस पार्टी संविधान के आधार पर पार्टी की संरचना और कामकाज का तरीका तय होता है, वही संविधान चुनाव आयोग के पास मौजूद नहीं था। इस वजह से फैसले की प्रक्रिया पर सीमाएं आ गईं। इस मौके पर यह सवाल भी उठाया गया कि राष्ट्रीय कार्यकारिणी के बारे में सही जानकारी क्यों नहीं दी गई।

इन सब बातों पर गौर करने के बाद चुनाव आयोग ने विधायक दल में बहुमत को आधार बनाकर फैसला लिया, ऐसी दलील नीरज किशन कौल ने सुप्रीम कोर्ट में दी। इसके साथ शिवसेना पार्टी और धनुष्यबाण चिन्ह के विवाद में पार्टी के भीतर लोकतंत्र का मुद्दा एक बार फिर केंद्र में आ गया है।

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