नागपुर पदवीधर चुनाव में कांग्रेस के अभिजीत वंजारी जीते, बीजेपी को गढ़ में हार
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नागपुर विभाग स्नातक निर्वाचन क्षेत्र चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार अभिजीत वंजारी ने बाजी मारी। बीजेपी के सुधाकर कोहळे के लिए मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, केंद्रीय मंत्री नितीन गडकरी और राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुळे ने प्रचार किया था।
नागपुर विभाग पदवीधर निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार अभिजीत वंजारी ने जीत दर्ज की है। नागपुर जैसा गढ़ हाथ से निकलने से बीजेपी को बड़ा झटका लगा है। पार्टी ने सुधाकर कोहळे के लिए पूरी रणनीति लगाई थी और बारीकी से नियोजन किया था, फिर भी असली वोटिंग का गणित उसके पक्ष में नहीं बैठा।
प्रचार में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, केंद्रीय मंत्री नितीन गडकरी और राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुळे ने पूरे जोश से हिस्सा लिया था। इसके बावजूद नतीजा उलटा रहा। अब नागपुर में चर्चा जोरों पर है कि निर्दलीय उम्मीदवार नितेश कराळे का फैक्टर चला या कांग्रेस ने बाजी पलट दी।
चर्चा है कि बीजेपी को सबसे ज्यादा नुकसान अपने भरोसे के बूथों पर हुआ। नागपुर में बीजेपी और संघ की अच्छी पकड़ मानी जाती है, लेकिन इन्हीं बूथों पर वोट बंट गए। कहा जा रहा है कि वहां की नाराजगी पार्टी को भारी पड़ी और "ये वोट तो अपने ही हैं" वाली सोच नुकसानदेह साबित हुई। यह भी चर्चा है कि मतदाताओं को गृहीत मान लिया गया और पदवीधरों की बुनियादी मांगों, उनकी समस्याओं और दिक्कतों की अनदेखी हुई।
बड़े नेताओं ने आकर एक-एक दिन प्रचार कार्यक्रम किए। मुख्यमंत्री, राजस्व मंत्री और केंद्रीय मंत्री सब उतरे। पर हार के बाद जोरदार चर्चा है कि जमीनी स्तर पर कार्यकर्ता गाफिल रहे या अति आत्मविश्वास में रहे। बताया जाता है कि कार्यकर्ताओं ने बूथ-बूथ घूमने के बजाय यह रुख अपनाया कि यहां तो अपना ही वोट है, कहां जाएगा। इसका नुकसान हुआ।
संघ परिवार, कार्यकर्ताओं का नेटवर्क और सत्ता में होना, सब साथ था, फिर भी बीजेपी करिश्मा नहीं दिखा सकी। मशीनरी साथ होने से जीत का भरोसा था और प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार की क्षमता को नजरअंदाज किया गया। इसी वजह से नागपुर विभाग में गहरा संपर्क होने के बावजूद गढ़ में बीजेपी को हार देखनी पड़ी।
पसंद क्रम का गणित भी अहम रहा। बीजेपी ने मतदाताओं से कोहळे को पहली पसंद देने की अपील की। लेकिन चुनाव का हिसाब सिर्फ पहली पसंद तक सीमित नहीं होता। दूसरी और तीसरी पसंद भी मायने रखती है और नतीजा उसी पर पलटता है। कांग्रेस ने यह बात ठीक से भांप ली, कराळे मास्टर ने भी यही भांपा, पर बीजेपी यहां कमजोर पड़ गई। पहली पसंद पर जरूरत से ज्यादा जोर उसे भारी पड़ा।
नितेश कराळे ने इस चुनाव में पूरे जोर से प्रचार किया। उन्होंने मैदान गुंजाया, पर खुद जीत नहीं पाए। पार्टी से निकाले जाने के बाद भी उन्होंने मैदान नहीं छोड़ा और 25 हजार वोट हासिल किए। कहा जा रहा है कि उनके फैक्टर का बड़ा नुकसान बीजेपी को हुआ। उनके मतपत्र पर दूसरी और तीसरी पसंद ने गणित पलट दिया।
कांग्रेस ने ठीक यही बातें कीं। उसने प्रचार मशीनरी चलाई, बारीक नियोजन किया और पहली पसंद के साथ दूसरी पसंद को भी अहमियत दी। इसलिए कई जगह दूसरी पसंद का फायदा कांग्रेस उम्मीदवार को मिला। पूर्व विदर्भ के कांग्रेस के आक्रामक नेता और उनकी मशीनरी भी काम आई, और कराळे मास्टर फैक्टर भी उपयोगी साबित हुआ।
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