पुणे ग्रेजुएट सीट पर BJP की हार, कार्यकर्ताओं की नाराजगी और रणनीति पर उठे सवाल
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पुणे डिवीजन ग्रेजुएट्स कॉन्स्टिट्यूएंसी में BJP की हार को अति-आत्मविश्वास, बाहर से लाए उम्मीदवार और कार्यकर्ताओं की नाराजगी से जोड़ा जा रहा है।
पुणे डिवीजन ग्रेजुएट्स कॉन्स्टिट्यूएंसी के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) को करारी हार का सामना करना पड़ा है। यह सिर्फ एक सीट या एक उम्मीदवार की हार नहीं है। इसे सत्ताधारी महायुति गठबंधन के अति-आत्मविश्वास, गलत रणनीति और जमीनी कार्यकर्ताओं के लंबे समय से दबे गुस्से पर करारी चोट के तौर पर पेश किया गया है। सत्ता पक्ष ने हर राजनीतिक दांव आजमाया और बड़े पैमाने पर पैसा लगाया, लेकिन पढ़े-लिखे और राजनीतिक रूप से जागरूक ग्रेजुएट मतदाताओं ने वोट के जरिए उसे जमीन पर ला दिया।
हार की वजह संगठन की कमजोरियां, बाहर से लाया गया उम्मीदवार और पिछले कुछ महीनों में पूरे महाराष्ट्र में बढ़ती सामाजिक नाराजगी का मिला-जुला असर बताई जा रही है। Gen Z की अगुवाई में हुए आक्रामक प्रदर्शन, महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग (MPSC) की तैयारी करने वालों का जारी गुस्सा और चुनाव से ठीक पहले मनोज जरांगे पाटील को लेकर वायरल हुई एक विवादित क्लिप, ये सब वे बातें हैं जो BJP की आधिकारिक उम्मीदवार डॉ. स्मिता जाधव के खिलाफ और महा विकास आघाड़ी (MVA) की NCP (SP) की हर्षदा देशमुख जाधव के पक्ष में जाती दिखीं।
BJP की एक बड़ी चूक बाहर से लाए गए उम्मीदवार को तरजीह देना मानी जा रही है। बताया जाता है कि इससे पार्टी के वफादार कार्यकर्ताओं की भावनाओं को ठेस पहुंची। चुनाव से ठीक पहले पार्टी ने ऐसा उम्मीदवार उतारा जिसका पार्टी की विचारधारा और उसके राजनीतिक संघर्षों से खास नाता नहीं था। हालात ऐसे रहे कि पहले नामांकन हुआ और पार्टी में औपचारिक एंट्री बाद में। जमीनी कार्यकर्ताओं को लगा कि उन्हें किनारे कर दिया गया। उन्होंने इस उम्मीदवारी को थोपा गया फैसला माना। पार्टी की मशीनरी ने पूरे मन से प्रचार नहीं किया और यह दूरी भारी पड़ी।
प्रचार में बड़े नेता भी उतरे। मुख्यमंत्री से लेकर नीचे तक के वरिष्ठ नेता मैदान में आए। देवेंद्र फडणवीस ने खास तौर पर पुणे के दौरे किए, कॉर्पोरेटरों के साथ बैठकें कीं और उन्हें आगाह किया कि उनका प्रदर्शन पार्टी के चुनावी रिपोर्ट कार्ड में दिखेगा। वरिष्ठ मंत्रियों ने दावा किया कि बड़ी तैयारी की गई है और हर 10 मतदाताओं पर एक कोऑर्डिनेटर लगाया गया है। लेकिन कागज पर बनी ये बड़ी योजनाएं और ऊंचे दावे मतदान के दिन असर नहीं दिखा सके। पुणे शहर में ग्रेजुएट और शिक्षक मतदाताओं का रजिस्ट्रेशन भी उस स्तर तक नहीं पहुंचा जितनी उम्मीद थी।
Gen Z के प्रदर्शनों और MPSC उम्मीदवारों की निराशा का भी पुणे ग्रेजुएट सीट के चुनावी माहौल पर गहरा असर पड़ा। लंबित मांगों और परीक्षा से जुड़े विवादों को लेकर MPSC की तैयारी करने वाले परेशान थे। रोजगार के मौके का इंतजार कर रहे और प्रशासन की बेरुखी से नाराज पढ़े-लिखे युवाओं ने सत्ता पक्ष के खिलाफ वोट देकर अपनी ताकत दिखाई। नतीजे ने सत्ता में बैठे लोगों को याद दिलाया है कि प्रदर्शन करने वाले युवाओं की चिंताओं और छात्रों के गुस्से को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इस संवेदनशील माहौल में मराठा आरक्षण के आक्रामक पैरोकार मनोज जरांगे पाटील से जुड़ी एक कथित लीक क्लिप चुनाव से ठीक पहले अहम मुद्दा बन गई। क्लिप से राजनीतिक तूफान उठा और प्रचार को लेकर चल रही बहस को नया मोड़ मिला। क्लिप के असली होने और उसके असर को लेकर तरह-तरह के दावे और जवाबी दावे किए गए। बताया जाता है कि उससे पैदा हुए सामाजिक ध्रुवीकरण और राजनीतिक माहौल का नुकसान आखिरी दौर में सत्ता पक्ष को हुआ। विपक्ष और MVA ने पूरे हालात का सोच-समझकर और नपे-तुले ढंग से फायदा उठाया।
MVA ने BJP खेमे की अंदरूनी नाराजगी को अपना मुख्य हथियार बनाया। वोटर लिस्ट से लेकर पोलिंग बूथ तक, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस ने स्थानीय स्तर पर आपस में नजदीकी तालमेल रखा। इसके उलट BJP खेमे में तालमेल की भारी कमी दिखी। गठबंधन सहयोगियों के नेता ऊपर से एकजुट नजर आए, पर यह एकता जमीन पर असरदार सहयोग में नहीं बदल सकी। अजित पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को BJP ने जरूरी अहमियत नहीं दी, और यह भी हार की वजहों में जुड़कर महंगा पड़ा।
इस तरह पुणे डिवीजन ग्रेजुएट्स कॉन्स्टिट्यूएंसी का नतीजा BJP के लिए सिर्फ राजनीतिक हार नहीं, बल्कि एक गंभीर चेतावनी बताया गया है जो आगे बड़े बदलावों का संकेत हो सकती है। कार्यकर्ताओं की अनदेखी, अति-आत्मविश्वास, सामाजिक नाराजगी, Gen Z और छात्रों का गुस्सा और गलत उम्मीदवार का चयन, इन सबने हार में अपना हिस्सा डाला। अगर पार्टी ने तुरंत, सख्ती से और ईमानदारी से आत्ममंथन नहीं किया तो आने वाले समय में महायुति गठबंधन के सामने और गंभीर राजनीतिक चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।
इसी चुनाव के दूसरे नतीजे में पुणे डिवीजन टीचर्स कॉन्स्टिट्यूएंसी से BJP के कौस्तुभ गवांदे जीते। उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार सचिन सानप को हराया। गिनती की शुरुआत से ही गवांदे आगे रहे। 27वें एलिमिनेशन राउंड के अंत में उन्हें 20,118 वोट मिले, जबकि निर्दलीय सचिन सानप को 13,642 और निर्दलीय दत्तात्रय सावंत को 12,687 वोट मिले। गवांदे की सानप पर बढ़त 6,476 वोट की रही। जीत पर BJP कार्यकर्ताओं ने जश्न मनाया। सानप ने हार मान ली। बताया गया कि उन्होंने कहा कि चुनाव के दौरान शायद वे कुछ वर्ग के मतदाताओं तक पहुंचने में पीछे रह गए।
ग्रेजुएट्स कॉन्स्टिट्यूएंसी में NCP (SP) की हर्षदा देशमुख-जाधव और BJP की डॉ. स्मिता जाधव के बीच मुकाबला कांटे का रहा। 39 राउंड के बाद हर्षदा देशमुख-जाधव को 1,11,717 वोट और डॉ. स्मिता जाधव को 1,02,797 वोट मिले, यानी 8,920 वोट की बढ़त। पहली पसंद के वोटों की गिनती पूरी होने के बाद भी कोई उम्मीदवार जीत के लिए जरूरी 1,13,095 वोट के कोटे तक नहीं पहुंचा, इसलिए गिनती अगली पसंद के हिसाब से आगे बढ़ी। 39वें राउंड के अंत में हर्षदा देशमुख-जाधव को 1,11,279 और डॉ. स्मिता जाधव को 1,02,427 वोट मिले। सूत्रों के मुताबिक हर्षदा देशमुख-जाधव के ग्रेजुएट्स सीट जीतने की उम्मीद थी।
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