धंगेकर बोले, शिंदे को फिर मिले नेतृत्व; बन ने शिवसेना पर लगाया महायुति को नुकसान का आरोप
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
विधान परिषद नतीजों के बाद महायुति में खींचतान के बीच शिंदे गुट के रवींद्र धंगेकर ने एकनाथ शिंदे को फिर नेतृत्व देने की मांग की, जबकि भाजपा प्रवक्ता नवनाथ बन ने शिवसेना पर आरोप लगाए।
शिंदे गुट के रवींद्र धंगेकर ने मांग की है कि एकनाथ शिंदे को एक बार फिर नेतृत्व दिया जाना चाहिए। विधान परिषद चुनाव के नतीजों के बाद महायुति के अंदर जो खींचतान चल रही है, उसी के बीच उन्होंने यह बात रखी।
धंगेकर ने कहा कि शिवसेना ने इस चुनाव में छुपकर समर्थन नहीं दिया, बल्कि खुलकर समर्थन दिया है। उनका सवाल था कि क्या आप लोग दोस्ती और तालमेल तलाशने में कम पड़ रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि यह सारी चर्चा है और यह चर्चा बन की नहीं है। धंगेकर के मुताबिक जयंत पाटील ने उन्हें फोन करके बधाई दी थी। उन्होंने कहा कि सभी अपने दोस्त हैं।
धंगेकर का कहना था कि यह लोकतंत्र की जीत है। उनके शब्दों में, लोकतंत्र में नतीजा जनता का फैसला होता है और जनता का फैसला हमें मानना ही पड़ता है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सरकार के काम पर वोट पड़ता है। ग्रेजुएट और शिक्षकों का सरकार से लगभग एक जैसा वास्ता पड़ता है। धंगेकर ने कहा कि शिक्षकों ने सरकार के खिलाफ वोट किया है, यानी शिक्षक नाराज हैं। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि जब एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री थे, तब भाजपा की सत्ता आई थी। इसी वजह से, उनका कहना है, शिंदे को दोबारा मौका मिलना चाहिए।
दूसरी तरफ भाजपा ने महायुति को लगे झटके का ठीकरा शिवसेना पर फोड़ा है। भाजपा का आरोप है कि सहयोगी दल का साथ छूटने से महायुति को नुकसान हुआ और शिवसेना के रुख से महायुति का गणित बिगड़ गया। भाजपा ने पुणे में समर्थन किसी और को देने और छत्रपति संभाजीनगर में राष्ट्रवादी के खिलाफ प्रचार करने को लेकर शिवसेना से सवाल किए हैं। भाजपा प्रवक्ता नवनाथ बन ने इस बारे में सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखी है।
बन ने पोस्ट में कहा, "शिक्षक और ग्रेजुएट निर्वाचन क्षेत्रों के चुनाव में पुणे और नागपुर में सहयोगी दल शिवसेना ने अपेक्षित सहयोग नहीं किया। पुणे में ऐन वक्त पर सचिन सानप को समर्थन देकर शिवसेना ने महायुति की एकजुटता को झटका दिया। उन्हें जो वोट मिले, वे ग्रेजुएट चुनाव में भाजपा को नहीं मिले। छत्रपति संभाजीनगर में अब्दुल सत्तार ने सीधे राष्ट्रवादी कांग्रेस के खिलाफ प्रचार किया। उसका भी नुकसान हुआ। शिवसेना ने महायुति का धर्म निभाकर भाजपा और राष्ट्रवादी कांग्रेस का साथ दिया होता, तो पांचों सीटों पर महायुति जीतती। लेकिन पुणे की एक सीट के लालच में शिवसेना ने सहयोगी दलों को मुश्किल में डाला और तीन सीटों पर जीत का मौका गंवा दिया। एक सीट के लिए सहयोगी दलों का नुकसान करने का रुख महायुति के हित में नहीं है।"
कमेंट
अभी कोई कमेंट नहीं। पहले आप लिखिए।