पुणे में शिक्षक सीट पर भाजपा के गावडे जीते, स्नातक सीट पर देशमुख-जाधव
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
पुणे विभाग के शिक्षक और स्नातक विधान परिषद चुनाव के नतीजे आ गए हैं। शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से भाजपा के कौस्तुभ गावडे जीते हैं, जबकि स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में शरद पवार की राष्ट्रवादी की हर्षदा देशमुख-जाधव ने जीत दर्ज की। इन नतीजों से राज्य की राजनीतिक समीकरणों को नई दिशा मिली है। गावडे की जीत से भाजपा खेमे में उत्साह है, तो देशमुख-जाधव की जीत से महाविकास आघाड़ी को बड़ा बल मिला है।
गावडे की जीत में मतदाताओं से उनका संपर्क, प्रचार की योजना और स्थानीय स्तर के राजनीतिक समीकरण अहम रहे। शिक्षक मतदाताओं के सवालों पर उम्मीदवार ने जो भूमिका रखी और संगठन के स्तर पर जो काम हुआ, उसका महत्व इस नतीजे से सामने आया है। स्नातक सीट पर देशमुख-जाधव की जीत से महाविकास आघाड़ी के खेमे में संतोष का माहौल है। मतगणना के दौरान उनकी बढ़त चर्चा का विषय बनी रही।
पसंद के क्रम वाले वोटों की वजह से मतगणना की प्रक्रिया काफी पेचीदा हो गई थी। आखिरी दौर तक नतीजे को लेकर उत्सुकता बनी रही, इसलिए इस जीत को खास अहमियत मिली है। इससे महाविकास आघाड़ी को स्नातक मतदाताओं के बीच अपनी जगह और मजबूत करने का मौका मिला है। हालांकि इस कामयाबी का श्रेय सिर्फ पार्टी समीकरणों को देने की बजाय उम्मीदवार के मतदाताओं से संपर्क, स्थानीय नेतृत्व की भूमिका और प्रचार के मुद्दों पर भी गौर करना होगा।
दोनों सीटों के नतीजों को सिर्फ जीत और हार के दायरे में नहीं देखा जा सकता। शिक्षक सीट पर भाजपा की कामयाबी और स्नातक सीट पर महाविकास आघाड़ी की बाजी से मतदाताओं की अपेक्षाओं और स्थानीय समीकरणों की अलग-अलग तस्वीर सामने आई है। एक सीट की जीत के आधार पर पूरे विभाग में राजनीतिक दबदबे का दावा करना ठीक नहीं होगा। इन नतीजों से दोनों गठबंधनों को अपनी संगठनात्मक ताकत की समीक्षा करने का मौका मिला है।
पुणे विभाग की स्नातक सीट पर हार के बाद भाजपा के उम्मीदवार चयन से लेकर चुनाव प्रबंधन तक की प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे हैं। शिक्षक सीट जीतने वाली भाजपा को स्नातक सीट पर नाकामी मिली। उम्मीदवारी में बदलाव और स्थानीय नेतृत्व के प्रचार तंत्र की खामियां इसकी वजह रहीं या नहीं, इसकी राजनीतिक गलियारों में चर्चा शुरू हो गई है।
पूर्व विधायक अरुण लाड के बेटे शरद लाड ने भाजपा में शामिल होने के बाद स्नातक सीट से चुनाव लड़ने की तैयारी की थी। उनकी उम्मीदवारी की चर्चा चल ही रही थी कि पार्टी ने ऐन वक्त पर डॉ. स्मिता जाधव को मौका दे दिया। इससे उम्मीदवारी की तैयारी कर रहे स्थानीय नेताओं की उम्मीदों पर पानी फिर गया। इस फैसले के बाद कार्यकर्ताओं का तंत्र कितना एकजुट रहा और शरद लाड के संपर्क का पार्टी को कितना फायदा मिला, यह सवाल अनुत्तरित है।
स्नातक मतदाताओं तक पहुंचने की योजना, मतदाता पंजीकरण का असल मतदान में कितना उपयोग हुआ और महायुति के घटक दलों की भागीदारी, इन सब की भी जांच करनी होगी। अगर पार्टी का गणित यह था कि शिक्षक सीट की जीत से स्नातक सीट पर भी कामयाबी मिलेगी, तो सवाल उठता है कि दोनों सीटों के मतदाताओं की अलग मानसिकता और स्थानीय समीकरणों को पहचानने में कहां चूक हुई।
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