पुणे में दोपहर 2 बजे तक शिक्षक सीट पर ग्रेजुएट सीट से ज्यादा वोटिंग
पुणे डिवीजन की ग्रेजुएट और शिक्षक सीट पर शुक्रवार सुबह 8 बजे वोटिंग शुरू हुई। दोपहर 2 बजे तक शिक्षक वोटरों में करीब 49.54 फीसदी और ग्रेजुएट वोटरों में 39.79 फीसदी ने वोट डाले।
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
पुणे डिवीजन की ग्रेजुएट और शिक्षक सीट के लिए शुक्रवार को सुबह 8 बजे वोटिंग शुरू हुई। शुरुआती छह घंटों में शिक्षक वोटरों का रुझान ग्रेजुएट वोटरों के मुकाबले ज्यादा दिखा।
दोपहर 2 बजे तक के आंकड़ों के मुताबिक रजिस्टर्ड ग्रेजुएट वोटरों में से करीब 39.79 फीसदी ने वोट डाले, जबकि शिक्षक वोटरों में यह आंकड़ा करीब 49.54 फीसदी रहा। यानी आंकड़ों में शिक्षक सीट आगे रही। हालांकि इन आंकड़ों से यह साफ नहीं होता कि वोटिंग ज्यादा क्यों हुई, और न ही यह कि आखिरी टर्नआउट पिछले चुनावों से ऊपर जाएगा या नहीं।
वोटरों तक जानकारी पहुंचने के डिजिटल तरीकों का जिक्र भी किया गया है। कहा गया कि वॉट्सऐप और सोशल मीडिया पर पोलिंग स्टेशन की लोकेशन, वोटर लिस्ट की जानकारी और वोटरों के नाम व सीरियल नंबर शेयर किए गए। इससे लोगों को घर से निकलने से पहले अपना पोलिंग स्टेशन ढूंढने और अपना नाम चेक करने में आसानी हो सकती है। पिछले चुनावों में सही पोलिंग स्टेशन खोजने और वोटर लिस्ट में नाम व सीरियल नंबर देखने में ज्यादा मेहनत लग सकती थी। जानकारी आसानी से मिले तो लोग पहले से तैयारी कर सकते हैं और पोलिंग स्टेशन पर बेवजह देर से बच सकते हैं। फिर भी इस चुनाव में टर्नआउट बढ़ाने में डिजिटल जानकारी का कितना हाथ रहा, इसकी अलग से पुष्टि नहीं हुई है।
नए वोटर रजिस्ट्रेशन और पसंदक्रम वाली वोटिंग के तरीके को लेकर बढ़ी जागरूकता को भी वोटिंग की संभावित वजह बताया गया है। ग्रेजुएट और शिक्षक वोटरों पर नौकरी और काम की जिम्मेदारियां होती हैं, इसलिए पोलिंग स्टेशन जाने से पहले तैयारी जरूरी हो जाती है। पसंदक्रम वाली वोटिंग में वोटरों को तय निर्देशों का ध्यान से पालन करना पड़ता है। पहली पसंद लिखना जरूरी है, और जो बैलेट पेपर वैधता की शर्तें पूरी नहीं करता, वह रद्द हो सकता है। इन नियमों की जानकारी हो तो बैलेट भरते वक्त गलती से बचा जा सकता है।
वोटिंग का समय सुबह 8 बजे से शाम 4 बजे तक तय था, यानी वोट डालने के लिए सीमित वक्त मिला। ऐसे में पहले से प्लान बनाना, वोटर लिस्ट की जानकारी चेक करना और पोलिंग स्टेशन की जगह पता होना प्रक्रिया को आसान बना सकता है।
दोपहर 2 बजे तक के आंकड़ों में शिक्षक सीट पर वोटिंग ग्रेजुएट सीट से ज्यादा रही। आखिरी दो घंटों में भी यही रुझान रहा या नहीं, और कुल टर्नआउट पिछले चुनावों के मुकाबले बढ़ा या नहीं, यह आखिरी आंकड़ों से ही पता चलेगा।
इस अनुभव से साफ जानकारी, वोटर लिस्ट की आसान सुविधा और पोलिंग स्टेशन पर अच्छे इंतजाम की अहमियत भी सामने आती है। इनसे योग्य वोटरों को प्रक्रिया समझने में मदद मिल सकती है। दोनों सीटों पर वोटिंग का ज्यादा भरोसेमंद आकलन आखिरी टर्नआउट के आंकड़ों से ही हो पाएगा।
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