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पुणे विभाग चुनाव: ग्रेजुएट में सोलापुर, टीचर्स में सतारा आगे, पुणे जिले में सबसे कम वोटिंग

पुणे विभाग के ग्रेजुएट और टीचर्स चुनाव में पश्चिम महाराष्ट्र के पांचों जिलों में अलग-अलग तस्वीर दिखी। नतीजे 27 अक्टूबर को आएंगे।

पुणे विभाग चुनाव: ग्रेजुएट में सोलापुर, टीचर्स में सतारा आगे, पुणे जिले में सबसे कम वोटिंग तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

पुणे विभाग के ग्रेजुएट और टीचर्स निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव में पश्चिम महाराष्ट्र के पांचों जिलों में वोटिंग की तस्वीर एक जैसी नहीं रही। ग्रेजुएट क्षेत्र में सोलापुर जिले ने बाजी मारी और वहां सबसे ज्यादा वोटिंग दर्ज हुई। टीचर्स क्षेत्र में सतारा जिला सबसे आगे रहा।

दूसरी तरफ दोनों ही निर्वाचन क्षेत्रों में पुणे जिले में वोटिंग का प्रतिशत बाकी जिलों के मुकाबले सबसे कम रहा। ग्रेजुएट क्षेत्र में सबसे कम वोटिंग सांगली में हुई, जबकि सबसे ज्यादा सोलापुर में। टीचर्स क्षेत्र में सतारा और सोलापुर की ऊंची वोटिंग के सामने पुणे की वोटिंग कम रही। राजनीतिक जानकारों के बीच यह फर्क चर्चा का मुद्दा बना हुआ है।

इस फर्क की वजह क्या है, इस पर कई बातें कही जा रही हैं। वोटरों में उदासीनता, स्थानीय प्रचार तंत्र की कमियां, उम्मीदवारों का संपर्क और राजनीतिक पार्टियों की संगठन के स्तर पर सक्रियता, ये सब कारण हो सकते हैं। फिर भी सिर्फ वोटिंग के प्रतिशत से यह सीधा नतीजा नहीं निकाला जा सकता कि किस पार्टी को ज्यादा समर्थन मिला।

पुणे विभाग के पांचों जिलों में स्थानीय नेतृत्व, शैक्षणिक संस्थाएं, सहकारी क्षेत्र और पार्टी संगठनों का जाल राजनीतिक तौर पर बेहद अहम माना जाता है। पश्चिम महाराष्ट्र के पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस के अलग-अलग गुटों के साथ भाजपा ने भी इस चुनाव में पूरी ताकत लगाई। इसलिए नतीजे के लिए सिर्फ वोटिंग का प्रतिशत नहीं, बल्कि उम्मीदवारों का निजी जनसंपर्क, स्थानीय नेताओं का असर और पार्टियों की संगठन की योजना भी फैसला करने वाली होगी।

ग्रेजुएट क्षेत्र में सबकी नजर राष्ट्रवादी कांग्रेस (शरदचंद्र पवार) की हर्षदा देशमुख-जाधव और भाजपा की डॉ. स्मिता जाधव के बीच सीधे मुकाबले पर है। टीचर्स क्षेत्र में कांग्रेस के मौजूदा विधायक जयंत आसगावकर, भाजपा के कौस्तुभ गावडे और दूसरे निर्दलीय उम्मीदवारों की वजह से मुकाबला बहुकोणीय और कांटे का हो गया है। इस चुनाव में बड़ी पार्टियों की संगठन की ताकत और उम्मीदवारों के निजी संपर्क की असली परीक्षा हो रही है।

नतीजों में वोटों का बंटवारा, उम्मीदवारों के स्थानीय असर वाले इलाके और पसंद के क्रम के हिसाब से होने वाली मतगणना अहम रहेंगे। मतगणना 27 अक्टूबर को होगी और उम्मीदवारों के साथ राजनीतिक पार्टियों की निगाहें उसी पर टिकी हैं। जिलावार वोटिंग की यह अलग-अलग तस्वीर आखिर किसके पक्ष में जाएगी, इसका जवाब मतगणना के बाद ही साफ होगा।

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