नागपुर स्नातक सीट: टिकट न मिलने पर अनिल सोले निर्दलीय लड़ेंगे, भाजपा में हलचल
विधान परिषद के नागपुर संभाग स्नातक चुनाव क्षेत्र में सुधाकर कोहले के नाम की घोषणा के बाद पूर्व मेयर अनिल सोले ने निर्दलीय नामांकन भरने की बात कही है।
विधान परिषद के नागपुर संभाग स्नातक चुनाव क्षेत्र में भाजपा ने सुधाकर कोहले के नाम की घोषणा की, और उसके तुरंत बाद पार्टी के अंदर बगावत की खबर आ गई। पूर्व विप सदस्य और पूर्व मेयर अनिल सोले ने सोशल मीडिया पर ऐलान किया कि वे निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में अपना नामांकन दाखिल करेंगे।
चुनाव के वक्त हर पार्टी में टिकट के दावेदार ज्यादा होते हैं, लेकिन टिकट एक ही को मिलता है। ऐसे में कुछ दावेदार बगावत का रास्ता पकड़ लेते हैं। भाजपा जैसी अनुशासित पार्टी में दूसरी पार्टियों की तुलना में ऐसा कम देखा जाता है। इस बार सोले के फैसले से पार्टी में हड़कंप मचा है। चर्चा यह है कि जिसने अपना राजनीतिक सफर एबीवीपी से शुरू किया, जो 5 बार नगरसेवक बना, मेयर रहा और इसी सीट से 2014 में विधान परिषद पहुंचा, ऐसा वरिष्ठ नेता 'पार्टी लाइन' से बाहर कैसे जा सकता है।
सोले ने भी टिकट मांगा था। वे काफी पहले से तैयारी में लगे थे और मतदाता पंजीयन के समय से ही लगातार मतदाताओं के संपर्क में थे। पिछले 2 महीने से उन्होंने इस सीट पर अपनी दावेदारी पेश कर रखी थी। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की मौजूदगी में उनके समर्थकों ने शक्ति प्रदर्शन किया था। करीब एक सप्ताह पहले सोले ने चुनाव लड़ने का संकल्प भी जताया था। उनके समर्थकों ने सोशल मीडिया पर 'हमारा तय हो गया' जैसी पोस्ट डालकर बगावत का संकेत पहले ही दे दिया था। वे सोमवार को दोपहर 1.30 बजे नामांकन दाखिल करेंगे।
2020 में भी सोले ने दोबारा टिकट मांगा था, पर सिटिंग विधायक होने के बावजूद उनका टिकट काटकर संदीप जोशी को उम्मीदवार बनाया गया था। जोशी वह चुनाव हार गए। अब सोले ने फिर दावेदारी की थी।
सोले के फैसले से भाजपा नेताओं को झटका लगा है और डैमेज कंट्रोल के लिए पार्टी में भागदौड़ शुरू हो गई है। उन्हें मनाने की कोशिश की जाएगी। डैमेज कंट्रोल में जुटे पार्टी के रणनीतिकारों ने भरोसा जताया है कि दो-तीन दिन में सोले अपना नामांकन वापस ले लेंगे। सोले भाजपा की कोर कमेटी के सदस्य हैं। रविवार शाम हुई बैठक में उन्हें भी बुलाया गया था, लेकिन वे उसमें नहीं आए। उनकी उम्मीदवारी से होने वाले नुकसान का आकलन भी किया जा रहा है।
एडवोकेट रमन सेनाह को भी मनाने की कोशिश की जाएगी। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शिशु वर्ग से ही संघ के काम से जुड़ाव का दावा करते हुए अभाविप, विहिप और भाजपा में किए अपने कामों का हवाला देकर उम्मीदवारी मांगी थी। इस बारे में वे मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी से भी मिले थे। पार्टी ने उनकी मांग पर ध्यान नहीं दिया, तो वे लोकजागृति मोर्चा की ओर से नामांकन दाखिल करने वाले हैं। वे भी भाजपा के अधिकृत उम्मीदवार के लिए मुश्किल बढ़ाएंगे। अब देखना होगा कि ये बागी नाम वापस लेते हैं या मैदान में डटे रहते हैं।
नागपुर में भाजपा के बागियों का पुराना इतिहास रहा है। 2009 में दक्षिण नागपुर सीट शिवसेना के हिस्से में गई थी, जो मोहन मते को मंजूर नहीं था। पार्टी के आधिकारिक फैसले के बावजूद उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में नामांकन भरा और मैदान में बने रहे। बाद में उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया गया और वे करीब एक दशक तक बाहर रहे। 2014 के बाद उन्हें फिर भाजपा में शामिल किया गया और वे अब विधायक हैं।
2009 के विधानसभा चुनाव में ही गिरीश व्यास ने भी टिकट न मिलने पर बगावत की थी। वे मध्य नागपुर सीट से दावेदार थे, लेकिन पार्टी ने यह सीट विकास कुंभारे को दी। इसके बाद व्यास ने निर्दलीय नामांकन भर दिया। मते की तरह वे अंत तक चुनाव नहीं लड़े। नितिन गडकरी से मुलाकात के बाद उन्होंने नाम वापस ले लिया था।
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