अमरावती शिक्षक सीट पर श्रीकांत देशपांडे ने भरे दो नामांकन, महायुति में खींचतान
शिवसेना शिंदे गुट के नेता श्रीकांत देशपांडे ने महायुति का उम्मीदवार तय होने से पहले ही पार्टी और निर्दलीय, दोनों तरह से अर्ज दाखिल कर दिए हैं।
अमरावती शिक्षक मतदारसंघ में महायुति के अंदर खींचतान शुरू हो गई है। शिवसेना शिंदे गुट के वरिष्ठ नेता श्रीकांत देशपांडे ने महायुति का अधिकृत उम्मीदवार घोषित होने से पहले ही दो उम्मीदवारी अर्ज दाखिल कर दिए हैं। राज्य में शिक्षक और पदवीधर मतदारसंघों के चुनाव की तैयारी चल रही है। महायुति और महाविकास आघाडी के घटक दल ज्यादा से ज्यादा सीटों पर दावा करने की रणनीति बना रहे हैं। सीट बंटवारे की आधिकारिक घोषणा अभी हुई नहीं है।
देशपांडे ने पहला अर्ज पार्टी यानी शिवसेना शिंदे गुट के अधिकृत बैनर तले भरा है। दूसरा अर्ज उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर दाखिल किया है। अमरावती शिक्षक मतदारसंघ के लिए महायुति ने अब तक अपने उम्मीदवार का नाम तय नहीं किया है। बताया गया है कि उम्मीदवारी कट जाने की भनक लगते ही देशपांडे ने फौरन दो अर्ज भर दिए।
देशपांडे ने साफ चेतावनी दी है कि पार्टी ने टिकट नहीं दिया तब भी वे चुनाव के मैदान से पीछे नहीं हटेंगे। टिकट न मिलने पर वे 'शिक्षक आघाडी' संगठन के जरिए चुनाव लड़ने का इरादा जता चुके हैं।
श्रीकांत देशपांडे ने कहा, "मैं 1992 से शिवसेना में हूं और पहले दिन से एकनाथ शिंदे के साथ हूं। इसलिए इस सीट और टिकट पर मेरा ही पहला हक है। उम्मीदवारी मिलना मेरा अधिकार है। टिकट नहीं मिला तब भी मैं चुनाव लडूंगा। शिक्षक मतदार समझदार हैं।" इस बयान के आधार पर कहा जा रहा है कि उन्होंने सिर्फ महायुति के स्थानीय नेतृत्व को ही नहीं, बल्कि वरिष्ठ नेताओं को भी सीधी चुनौती दी है।
देशपांडे का राजनीतिक सफर भी इस सीट से जुड़ा है। साल 2014 में वे शिवसेना के चिन्ह पर चुनाव लड़कर अमरावती शिक्षक मतदारसंघ से आमदार (MLC) चुने गए थे। साल 2020 के चुनाव में वे 'शिक्षक आघाडी' के उम्मीदवार थे, लेकिन निर्दलीय उम्मीदवार किरण सरनाईक से हार गए थे। अब वे एक बार फिर इस सीट पर दावा ठोककर मैदान में उतरे हैं।
महायुति की परेशानी इसलिए बढ़ी है कि अधिकृत उम्मीदवार घोषित होने के बाद देशपांडे की निर्दलीय उम्मीदवारी से महायुति के वोट बंट सकते हैं। इसका फायदा विरोधी पक्ष यानी महाविकास आघाडी (MVA) को मिल सकता है। महायुति में कुछ सीटों पर भाजपा और बाकी पर शिंदे गुट दावा कर रहा है। अमरावती की इस बगावत से सहयोगी दलों में अविश्वास और तनाव पैदा होने की बात कही गई है।
चुनाव के ठीक पहले कार्यकर्ताओं में उलझन का माहौल है। अगर यह बगावत शांत नहीं हुई तो इसका सीधा फायदा विरोधी पक्ष को मिलने की संभावना जताई जा रही है। अब पूरे राज्य की नजर इस पर है कि भाजपा, शिवसेना (शिंदे गुट) और राष्ट्रवादी (अजित पवार गुट) के वरिष्ठ नेता अमरावती की इस बगावत को कैसे रोकते हैं और सीट बंटवारे का पेच कैसे सुलझाते हैं।
यह मामला सिर्फ एक सीट तक सीमित नहीं है। आने वाले चुनावों से पहले महायुति के अंदरूनी तालमेल पर भी इससे सवाल खड़े हुए हैं। देखना होगा कि मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और महायुति के वरिष्ठ नेता श्रीकांत देशपांडे को मनाकर बगावत शांत कर पाते हैं, या अमरावती में महायुति को तिकोने या चौकोने मुकाबले का सामना करना पड़ता है।
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