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कर्जत हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट का CAMIT ने किया समर्थन, जंगल बहाली की मांग

कर्जत हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट का CAMIT ने किया समर्थन, जंगल बहाली की मांग तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
शहर PT24 टीम

चैंबर ने कहा कि उद्योग का विकास और पर्यावरण की रक्षा साथ-साथ चलनी चाहिए, मुख्यमंत्री फडणवीस को चिट्ठी भेजी।

चैंबर ऑफ एसोसिएशंस ऑफ महाराष्ट्र इंडस्ट्री एंड ट्रेड (CAMIT) ने रायगढ़ जिले के कर्जत में टोरेंट पावर के 3,000 मेगावॉट सइदोंगर पम्प्ड स्टोरेज हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट को लेकर अपनी राय रखी है। इस प्रोजेक्ट के लिए 32,490 पेड़ काटने का प्रस्ताव है और इसी पर विवाद चल रहा है। CAMIT का कहना है कि औद्योगिक विकास और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के खिलाफ नहीं हैं, दोनों को साथ लेकर चलना होगा।

CAMIT के अध्यक्ष और भारतीय उद्योग व्यापार मंडल (BUVM) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. दीपेन अग्रवाल ने कहा कि महाराष्ट्र की बढ़ती औद्योगिक अर्थव्यवस्था को भरोसेमंद बिजली, आधुनिक ऊर्जा ढांचा, नया निवेश और रोजगार चाहिए। नवीकरणीय ऊर्जा को जोड़ने और ऊर्जा सुरक्षा में मदद करने वाले प्रोजेक्ट राज्य के उद्योगों की प्रतिस्पर्धा मजबूत करने के लिए जरूरी हैं।

डॉ. अग्रवाल के मुताबिक, "CAMIT कर्जत हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट को लागू करने का पुरजोर समर्थन करता है, क्योंकि महाराष्ट्र की ऊर्जा सुरक्षा और औद्योगिक विकास के लिए इसकी रणनीतिक अहमियत है। लेकिन विकास के साथ अपने प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरणीय विरासत को बचाने की उतनी ही मजबूत प्रतिबद्धता भी होनी चाहिए।" उन्होंने कहा कि असली सवाल यह नहीं कि विकास हो या नहीं, बल्कि यह है कि उसे जिम्मेदारी से कैसे किया जाए और जो पर्यावरणीय नुकसान टाला नहीं जा सकता, उसका वैज्ञानिक आकलन हो, उसे कम किया जाए और उसकी ठीक से भरपाई हो।

सरकार के कथित प्रस्ताव के अनुसार मुआवजे के तौर पर करीब 90,000 पौधे लगाए जाएंगे। डॉ. अग्रवाल ने कहा कि ऐसी पहल अच्छी है, लेकिन सिर्फ पौधे लगाना पुराने पेड़ों और स्थापित प्राकृतिक जंगलों के नुकसान का पर्याप्त पर्यावरणीय इलाज नहीं हो सकता। उन्होंने समझाया, "प्राकृतिक जंगल सिर्फ पेड़ों का झुंड नहीं होता। यह दशकों में बना जटिल इकोसिस्टम है, जो जैव विविधता, वन्यजीवों के ठिकानों, भूजल रिचार्ज, मिट्टी के संरक्षण और जलवायु संतुलन को सहारा देता है। पुराने पेड़ों की जगह नए पौधे लगाने से ये काम तुरंत बहाल नहीं हो सकते।" उनका कहना था कि पर्यावरणीय मुआवजा लगाए गए पौधों की गिनती से नहीं, बल्कि बहाल किए गए पारिस्थितिक मूल्य, बचाई गई जैव विविधता और लंबे समय के नतीजों से नापा जाना चाहिए।

CAMIT ने सुझाव दिया है कि प्रोजेक्ट डेवलपर, महाराष्ट्र सरकार और वन विभाग के साथ तालमेल में, प्रोजेक्ट के साथ-साथ एक वैज्ञानिक ढंग से बना, पर्याप्त फंड वाला और स्वतंत्र निगरानी वाला पर्यावरण संरक्षण कार्यक्रम चलाए। चैंबर ने छह उपाय रखे हैं।

पहला, मौजूदा प्राकृतिक जंगलों का संरक्षण। सिर्फ मुआवजे के तौर पर पौधारोपण पर निर्भर रहने की जगह, जहां संभव हो वहां उसी पारिस्थितिक क्षेत्र में चिह्नित बिगड़े और कमजोर वन इलाकों की सुरक्षा, पुनर्जीवन और लंबे समय के संरक्षण का खर्च डेवलपर से लिया जाए। प्राथमिकता मौजूदा वन इकोसिस्टम को बचाने, उन्हें और बिगड़ने से रोकने और उनकी प्राकृतिक जैव विविधता लौटाने को मिले।

दूसरा, व्यापक पारिस्थितिक बहाली। प्रोजेक्ट के असली पर्यावरणीय असर को देखकर वैज्ञानिक कार्यक्रम बने, जिसमें जैव विविधता संरक्षण, वन्यजीवों के ठिकाने और गलियारे, मिट्टी की स्थिरता, कटाव रोकना, जलग्रहण क्षेत्र का प्रबंधन और स्थानीय वनस्पति की बहाली शामिल हो।

तीसरा, समर्पित पर्यावरण संरक्षण फंड। CAMIT ने एक अलग रखा गया पर्यावरण संरक्षण एवं बहाली फंड बनाने की सिफारिश की है, जिसका खर्च डेवलपर उठाए और जो सरकार की निगरानी वाले उचित तंत्र के तहत चले। यह फंड कम से कम 10-15 साल तक पारिस्थितिक बहाली, जंगल की सुरक्षा, जैव विविधता की निगरानी और रखरखाव को कवर करे, और जरूरत पड़ने पर उससे लंबी प्रतिबद्धता भी हो।

चौथा, नतीजों से जुड़ी पर्यावरणीय जिम्मेदारियां। पर्यावरण से जुड़े वादे सिर्फ खर्च या लगाए गए पौधों की संख्या से नहीं, मापे जा सकने वाले नतीजों से जुड़ें। इनमें स्थानीय वनस्पति का बचना और बढ़ना, वन आवरण का फिर उगना, वन्यजीवों के ठिकानों की बहाली, मिट्टी और पानी के संरक्षण के नतीजे और जैव विविधता में सुधार गिने जाएं। समय-समय पर स्वतंत्र तीसरे पक्ष से आकलन हो और रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएं।

पांचवां, कंपनी और वन विभाग की तय जिम्मेदारियां। तय पर्यावरणीय राहत और बहाली की जिम्मेदारी का खर्च और अमल डेवलपर के जिम्मे हो। राज्य सरकार और महाराष्ट्र वन विभाग उपयुक्त संरक्षण क्षेत्र तय करें, वैज्ञानिक बहाली योजनाओं को मंजूरी दें, अमल की स्वतंत्र निगरानी करें और पर्यावरणीय वादों का सख्ती से पालन कराएं। साफ जवाबदेही, लागू कराए जा सकने वाले पड़ाव और नियम न मानने पर सुधारात्मक कदम भी इस ढांचे का हिस्सा हों।

छठा, स्थानीय समुदाय की भागीदारी। खासकर जंगल के संसाधनों पर निर्भर रहने वाले स्थानीय लोग संरक्षण, सुरक्षा और निगरानी में सक्रिय रूप से जुड़ें। इससे टिकाऊ रोजगार के मौके बनेंगे और पर्यावरण संरक्षण में समुदाय की अपनी हिस्सेदारी की भावना भी बढ़ेगी।

डॉ. अग्रवाल ने बताया कि CAMIT ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को चिट्ठी लिखी है। इसमें इस रणनीतिक रूप से अहम ऊर्जा प्रोजेक्ट को समर्थन दिया गया है और राज्य सरकार से पर्यावरणीय जिम्मेदारी के लिए ज्यादा व्यापक और नतीजों पर टिका तरीका अपनाने का आग्रह किया गया है। चैंबर ने कहा है कि सरकार प्रस्तावित संरक्षण ढांचे को प्रोजेक्ट की पर्यावरणीय शर्तों में शामिल करने पर विचार करे, जिसमें डेवलपर और वन विभाग की जिम्मेदारियां साफ तय हों। यह भी सुझाया गया है कि ढांचा योग्य पर्यावरण और पारिस्थितिकी विशेषज्ञों से सलाह लेकर बने, ताकि बहाली के उपाय वैज्ञानिक रूप से सही, स्वतंत्र रूप से जांचे जाने लायक और टिकाऊ हों।

डॉ. अग्रवाल ने कहा, "हमारा मानना है कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस जी के प्रगतिशील नेतृत्व में महाराष्ट्र ऐसा मॉडल बना सकता है, जहां बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट सिर्फ आर्थिक वृद्धि में ही नहीं, बल्कि मापे जा सकने वाले, लंबे समय के पारिस्थितिक संरक्षण में भी योगदान दें।"

उन्होंने दोहराया कि व्यापार और उद्योग जगत निवेश, ढांचागत विकास, रोजगार पैदा करने और महाराष्ट्र को अग्रणी औद्योगिक ताकत बनाने की सरकार की सोच का साथ देने के लिए प्रतिबद्ध है। लेकिन पर्यावरण की रक्षा को सिर्फ कानूनी औपचारिकता या मुआवजे के पौधारोपण की कवायद नहीं समझा जाना चाहिए। उनके शब्दों में, "उद्योग को बिजली चाहिए, निवेश को इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए और समाज को रोजगार चाहिए। उतना ही हर नागरिक को साफ हवा, पानी, जैव विविधता और स्वस्थ पर्यावरण चाहिए। ये एक-दूसरे के पूरक जरूरतें हैं, आपस में टकराने वाली प्राथमिकताएं नहीं।"

अपनी बात का समापन उन्होंने इन शब्दों में किया: "प्रोजेक्ट आगे बढ़े, उद्योग फलें-फूलें और रोजगार बढ़े, लेकिन साथ ही यह भी पक्का करें कि अर्थपूर्ण, मापे जा सकने वाले और टिकाऊ संरक्षण प्रयासों से प्रकृति सुरक्षित रहे। सच्चा विकास सिर्फ उस समृद्धि का नाम नहीं जो हम आज बनाते हैं, बल्कि उस प्राकृतिक विरासत का भी है जो हम कल के लिए बचाकर रखते हैं।"

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