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कर्जत की तापकीरवाडी में टाटा के खोदकाम से आदिवासी डरे हुए, वादे के बाद भी न जमीन मिली न घर

कर्जत तालुका की तापकीरवाडी और धनगरवाडा के आदिवासी परिवार ब्लास्टिंग से घरों पर गिरते पत्थरों और मिट्टी के ऊंचे ढेरों के साए में जी रहे हैं। पुनर्वास के लिखित आश्वासन को ग्यारह महीने हो गए, कार्यवाही कोई नहीं हुई।

कर्जत की तापकीरवाडी में टाटा के खोदकाम से आदिवासी डरे हुए, वादे के बाद भी न जमीन मिली न घर तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

कर्जत तालुका की तापकीरवाडी और धनगरवाडा में रहने वाले आदिवासी परिवार इन दिनों डर के साए में जी रहे हैं। पास में टाटा समूह की तरफ से धरने के लिए बांध बनाने का काम चल रहा है और उसका खोदकाम पिछले एक साल से जारी है। खोदकाम के लिए की जा रही ब्लास्टिंग के बाद आदिवासी बस्ती और धनगर वाडा की बस्ती के घरों पर पत्थर आकर गिर रहे हैं।

बस्ती की बुजुर्ग महिलाओं ने खुलेआम आरोप लगाया है कि उनकी कोई भी मांग माने बिना टाटा कंपनी आदिवासियों की जान लेने पर तुली है। उनका कहना है कि एक साल से यही सुनने को मिल रहा है कि जमीन लेकर उन्हें घर बनाकर दिए जाएंगे, लेकिन अब तक ऐसा कुछ हुआ नहीं।

कर्जत तालुका के भिवपुरी ग्राम पंचायत इलाके में भिवपुरी गांव की टाटा कंपनी की अपनी जमीन पर यह बांध बन रहा है। कंपनी की जमीन में 100 मीटर तक खुदाई करके पानी जमा करने वाला बड़ा तालाब तैयार किया जा रहा है। बिजली स्टोरेज करने के लिए 1000 मेगावॉट का पंप स्टोरेज प्रोजेक्ट साल भर से चल रहा है। काम शुरू हुआ तब से मिट्टी और पत्थर तोड़कर खुदाई हो रही है और बड़े पैमाने पर धमाके किए जा रहे हैं।

65 एकड़ जमीन में गहरा गड्ढा खोदा जा रहा है। खुदाई पिछले साल से चल रही है और इससे इलाके का पर्यावरण खतरे में आ गया है। भारी मशीनें लाई गई हैं और काम दिन-रात चलता है। जरूरत पड़ने पर धमाके किए जाते हैं और जो मिट्टी निकलती है, उसे एक तरफ जमा किया जा रहा है। एक तरफ पत्थर और दूसरी तरफ मिट्टी के ढेर हैं, जो इमारतों जितने ऊंचे हो गए हैं। गए साल मई से खुदाई चल रही है और मिट्टी के ढेर बाहर निकलते जा रहे हैं, जो अब बड़े-बड़े पहाड़ जैसे बन गए हैं।

गांव वालों का डर यही है कि ये मिट्टी के पहाड़ किसी दिन तापकीरवाडी धनगरवाडा के 22 घरों पर गिर पड़े तो बड़ा हादसा हो सकता है। बिजली बनाने में काम आने वाले पानी को स्टोर करके दोबारा इस्तेमाल करने के लिए यह खुदाई की जा रही है, पर स्थानीय लोगों के लिए यह जानलेवा साबित हो सकती है।

आरोप है कि प्रशासन ने इस बारे में कोई हरकत नहीं की। इसी वजह से तापकीरवाडी के धनगरवाडा के आदिवासी जान हथेली पर रखकर जी रहे हैं। धरने की दीवार से सटी तापकीरवाडी और धनगर वाडा का पुनर्वास करने का आश्वासन टाटा कंपनी की तरफ से दिसंबर 2025 में हुए अनशन के वक्त दिया गया था। उस लिखित आश्वासन को ग्यारह महीने हो चुके हैं और कंपनी ने किसी तरह की कार्यवाही नहीं की है।

इसलिए पूरा बरसात का मौसम यहां के आदिवासियों ने जान मुट्ठी में लेकर काटा। घरों पर पत्थर आने की वजह से रात को छोटे बच्चों को गोद में लेकर जागते हुए रात गुजारने की नौबत आदिवासी परिवारों पर आई है। सीता गंगाराम शिंदे ने सवाल उठाया कि पत्थर घर पर आने से चोट लगने का डर है, ऊपर से घरों की दीवारों में दरारें पड़ गई हैं, तो क्या टाटा कंपनी आदिवासियों के घर गिरने का इंतजार कर रही है?

सीता गंगाराम शिंदे ने कहा, "हमें लगने लगा है कि हमारी मौत इसी टूटे-फूटे घर में लिखी है। हमें जमीन नहीं दे रहे, घर बनाकर नहीं दे रहे, टाटा कंपनी साधारण पीने का पानी तक नहीं देती। हमें ऐसा लगने लगा है कि वे हमारी जिंदगी खत्म करना चाहते हैं।"

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