कर्जत में टोरंट प्रोजेक्ट के लिए पेड़ कटाई पर विरोध, झाड़ों से लिपटकर चिपको आंदोलन करेंगे लोग
कर्जत पर्यावरण बचाव समिति ने पाली तर्फे कोतवाल खलाटी में कट रहे पेड़ों से लिपटकर चिपको आंदोलन करने का ऐलान किया है।
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कर्जत तालुका के पाली तर्फे कोतवाल खलाटी में प्रस्तावित टोरंट हायड्रॉलिक प्रोजेक्ट के खिलाफ एक अनोखा आंदोलन होने जा रहा है। इस प्रोजेक्ट का विरोध कर रही कर्जत पर्यावरण बचाव समिति ने ऐलान किया है कि जो पेड़ काटे जा रहे हैं, उनसे लिपटकर चिपको आंदोलन किया जाएगा।
समिति के मुताबिक कर्जत में बनने वाले टोरंट प्रोजेक्ट के लिए वन विभाग की 640 हेक्टेयर जमीन दी जानी है। 7 अक्टूबर को वन जमीन देने का फैसला हुआ और उसके फौरन बाद वहां के ठेकेदार ने पेड़ काटना शुरू कर दिया। प्रोजेक्ट के काम के लिए सीधे पेड़ काटने की मुहिम शुरू होने से कर्जत पर्यावरण बचाव समिति आक्रामक हो गई है।
समिति ने वन विभाग की मनमानी का जवाब मांगने और पाली तर्फे कोतवाल खलाटी इलाके में पेड़ों की कटाई रुकवाने के लिए पेड़ों से लिपटने का यह आंदोलन करने का फैसला किया है। चिपको आंदोलन का ऐलान होते ही कर्जत तालुका के अलग-अलग हिस्सों से बेशुमार नौजवान और पर्यावरण प्रेमी तैयार हो गए। उन्होंने इसके लिए अपने नाम भी दिए हैं। इसमें सामाजिक कार्यकर्ता, राजनीतिक पार्टियों के कार्यकर्ता, किसान और प्रोजेक्ट से प्रभावित लोग हिस्सा लेंगे।
आंदोलन पाली तर्फे कोतवाल खलाटी इलाके में ही होगा। समन्वयक ॲड. कैलास मोरे के साथ सचिन गायकवाड, अक्षय गायकवाड, राहुल गायकवाड, राजेश वेहेले, सतिश बोराडे, जगदीश दगडे, प्रणेश यादव, तानाजी तुरड, दिनेश आढाव, किरण राणे, हरेश जानु सोनावळे, एकनाथ खडेकर, गणेश मसणे, पंकेश जाधव, महेश आढाव, स्विटी बार्शी, अजय कराळे, मिलिंद लाड, जयेश मसणे, ऋषिकेश भगत, जगदीश माळी, जितेंद्र गवळी मानिवली, शरद हजारे, प्रदीप ढोले, संजय देशमुख, मयूर आंग्रे, विनोद गजानन दळवी-अवसरे, अर्जुन माळी, महेंद्र भोईर, पंकज गायकर और प्रविण राणे इसमें शामिल होंगे। यह आंदोलन कैसे होगा, इसे लेकर लोगों में उत्सुकता है।
ॲड. कैलास मोरे, समन्वयक, कर्जत पर्यावरण बचाव समिति ने कहा, "सिर्फ कागजी अधिसूचना निकलने पर वन विभाग ने इतने बड़े पैमाने पर पेड़ काटने की इजाजत कैसे दे दी? 640 हेक्टेयर पर लाखों पेड़ हैं, फिर भी यह संख्या कम दिखाकर कुदरत की बलि चढ़ाई जा रही है। हम एक भी पेड़ नहीं कटने देंगे, इसके लिए पेड़ों से लिपटकर चिपको आंदोलन करेंगे।"
समिति ने वन विभाग के कामकाज पर कई सवाल उठाए हैं। पहला सवाल यह है कि अधिसूचना मिलते ही जल्दबाजी में पेड़ों की कटाई क्यों शुरू कर दी गई। दूसरा, 640 हेक्टेयर पर लाखों पेड़ होने के बावजूद उनकी संख्या सिर्फ 32,480 क्यों दिखाई गई। तीसरा, काटे गए पेड़ों को दोबारा लगाने की ठोस नीति क्या है। और चौथा, वन जमीन के बदले दूसरी जमीन कहां दी गई है।
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