फेफड़ों के कैंसर का हवा के प्रदूषण से रिश्ता, बारीक कण बन रहे हैं बड़ा खतरा
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M|O|C कैंसर केयर के डॉ. निखिल एम. शिरसी के मुताबिक लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहना फेफड़ों के कैंसर का अहम जोखिम है, चाहे आदमी धूम्रपान करता हो या नहीं।
हम जो सांस लेते हैं, उसका असर सीधे सेहत पर पड़ता है। फेफड़ों के कैंसर की बात आती है तो सबसे पहले ध्यान सिगरेट-बीड़ी पर जाता है। लेकिन बढ़ते वैज्ञानिक सबूत बताते हैं कि एक और अहम जोखिम सामने आ रहा है, और वह है लंबे समय तक हवा के प्रदूषण के संपर्क में रहना। इसका असर धूम्रपान करने वालों पर भी हो सकता है और न करने वालों पर भी। इस बारे में M|O|C कैंसर केयर के कैंसर विशेषज्ञ डॉ. निखिल एम. शिरसी ने जानकारी दी है।
भारत में गाड़ियों से निकलने वाला धुआं, निर्माण कामों की धूल, कारखानों का उत्सर्जन और मौसमी धुंध लाखों लोगों को प्रभावित करती है। गंदी हवा का मतलब सिर्फ खांसी या सांस लेने में तकलीफ नहीं होता। लंबे समय तक ऐसी हवा में रहने से कैंसर होने में भी मदद मिल सकती है।
इसमें सबसे ज्यादा चिंता की बात PM2.5 है। ये 2.5 माइक्रोमीटर या उससे भी कम व्यास के बेहद बारीक कण होते हैं। ये सांस के रास्ते फेफड़ों के अंदर तक पहुंच सकते हैं और अपने साथ नुकसानदेह केमिकल भी शरीर में ले जा सकते हैं। इससे लंबे समय तक जलन यानी सूजन, कोशिकाओं पर ऑक्सीडेटिव तनाव और कोशिकाओं को नुकसान जैसी प्रक्रियाएं हो सकती हैं। कई सालों में इन प्रक्रियाओं की वजह से कैंसर पनपने के हालात बन सकते हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के तहत काम करने वाली इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (IARC) ने 2013 में बाहरी हवा के प्रदूषण और उसके बारीक कणों को ग्रुप 1 के कैंसर पैदा करने वाले तत्वों (Group 1 carcinogens) में रखा। इसका मतलब है कि इंसानों में कैंसर होने के लिए इनके खिलाफ पूरे वैज्ञानिक सबूत मौजूद हैं। इस प्रदूषण से सबसे पक्के तौर पर जुड़ा कैंसर फेफड़ों का कैंसर है।
2021 में वैज्ञानिक पत्रिका Environmental Health Perspectives में छपे एक व्यवस्थित रिव्यू और मेटा-विश्लेषण में बारीक कणों के लंबे संपर्क से जुड़े 47 अध्ययनों को परखा गया। इसके मुताबिक PM2.5 के लंबे संपर्क में हवा के प्रति घन मीटर पर 10 माइक्रोग्राम की बढ़ोतरी होने पर फेफड़ों के कैंसर का खतरा 16 प्रतिशत बढ़ा हुआ पाया गया।
यह 16 प्रतिशत सापेक्ष जोखिम में बढ़ोतरी है। इसका मतलब यह नहीं कि किसी व्यक्ति को फेफड़ों का कैंसर होने की कुल संभावना 16 प्रतिशत-बिंदु बढ़ जाती है। जरूरी बात यह भी है कि प्रदूषण के संपर्क में आने वाले हर आदमी को कैंसर होगा ही, ऐसा नहीं है। यह खतरा प्रदूषण की तीव्रता, कितने समय तक संपर्क रहा, धूम्रपान का इतिहास, काम की जगह के नुकसानदेह तत्व और शरीर की संवेदनशीलता जैसी कई बातों पर टिका होता है। धूम्रपान फेफड़ों के कैंसर का मुख्य जोखिम है, फिर भी धूम्रपान न करने वालों को भी इस बीमारी का खतरा हो सकता है।
भीड़भाड़ वाली सड़कों के पास, औद्योगिक इलाकों में या निर्माण वाले इलाकों में रहने वालों को प्रदूषण का ज्यादा संपर्क हो सकता है। ट्रैफिक संभालने वाले कर्मचारी और घर से बाहर काम करने वाले मजदूरों को भी खतरा हो सकता है। इसके अलावा घर में तंबाकू का धुआं, खाना पकाने के लिए ठोस ईंधन का इस्तेमाल और हवा की आवाजाही कम होना भी प्रदूषण का कुल बोझ बढ़ा सकता है।
प्रदूषण का संपर्क कम करने के लिए कुछ उपाय किए जा सकते हैं। अपने इलाके का हवा की गुणवत्ता का इंडेक्स (AQI) नियमित देखें। प्रदूषण का स्तर गंभीर हो तो बाहर तेज कसरत से बचें। तंबाकू के धुएं से दूर रहें। बाहर की हवा ठीक हो तब घर में हवा आने-जाने का सही इंतजाम रखें। जरूरत पड़ने पर ठीक से फिट होने वाला N95 मास्क लगाएं। फिर भी ये निजी उपाय बड़े पैमाने के हवा के प्रदूषण के सारे खतरे पूरी तरह खत्म नहीं कर सकते।
डॉक्टर ने साफ कहा, 'हम कौन सी हवा में सांस लेते हैं, यह हमेशा हमारे हाथ में नहीं होता। लेकिन साफ हवा कैंसर की रोकथाम का एक अहम हिस्सा है, यह हमें समझना चाहिए।'
हर मरीज में फेफड़ों का कैंसर एक ही वजह से नहीं होता। यह भी जरूरी नहीं कि प्रदूषण के संपर्क में आने से कैंसर हो ही जाए। फिर भी आबादी के स्तर पर लंबे समय के हवा के प्रदूषण का संपर्क घटाया जाए तो कई बीमारियों से बचाव हो सकता है और जिन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया, उनकी सेहत भी सुरक्षित रखने में मदद मिल सकती है।
इसके लिए साफ-सुथरी परिवहन व्यवस्था, कारखानों के उत्सर्जन पर सख्त नियंत्रण, निर्माण स्थलों पर धूल का इंतजाम और हवा की गुणवत्ता की लगातार निगरानी को जन स्वास्थ्य के लिहाज से प्राथमिकता देना जरूरी है। फेफड़ों के कैंसर में रोकथाम के उपाय लक्षण दिखने से बहुत पहले शुरू हो जाते हैं, और इन कोशिशों में साफ हवा की भूमिका बेहद अहम है।
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