खून के नमूने से कैंसर कोशिकाओं की पहचान, नवी मुंबई में ऑन्कोडिस्कवर तकनीक पेश
नवी मुंबई में एक्ट्रेक की अंतरराष्ट्रीय परिषद 'कैमो 2026' में खून के नमूने से कैंसर कोशिकाएं ढूंढने वाली 'ऑन्कोडिस्कवर' तकनीक और एनजीएस जांचें पेश की गईं।
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कैंसर का पता लगाने, इलाज कितना असर कर रहा है यह जांचने और बीमारी के लौटने का खतरा परखने के लिए खून के नमूने पर चलने वाली नई तकनीक काम आ सकती है। नवी मुंबई में टाटा मेमोरियल सेंटर के एडवांस्ड सेंटर फॉर ट्रीटमेंट, रिसर्च एंड एजुकेशन इन कैंसर यानी एक्ट्रेक में 'कैमो 2026' नाम की अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक परिषद हुई। इसमें एक्टोरियस इनोवेशंस एंड रिसर्च कंपनी ने खून में कैंसर कोशिकाएं ढूंढने वाली 'ऑन्कोडिस्कवर' तकनीक और अगली पीढ़ी की जीन सीक्वेंसिंग पर आधारित, यानी एनजीएस, जांचें पेश कीं।
इन दोनों तकनीकों को साथ में इस्तेमाल करने से कैंसर से जुड़ी कोशिकाओं और जीन में हुए बदलावों की जानकारी मिल सकती है। इससे इलाज की योजना और असरदार बनाने में मदद हो सकती है।
कंपनी की पेश की हुई एनजीएस जांचों से कैंसर से जुड़े जीन बदलावों का बारीकी से विश्लेषण किया जा सकता है। इसलिए मरीज की बीमारी का स्वरूप देखकर सही इलाज चुनना, इलाज के दौरान बीमारी में आ रहे बदलावों पर नजर रखना और इलाज के बाद कैंसर की कुछ कोशिकाएं बची हैं या नहीं, इसके संकेत ढूंढना मुमकिन हो सकता है। इन जांचों में सीटी-डीएनए, जी-डीएनए और आरएनए का विश्लेषण होता है।
कंपनी के मुताबिक 'ऑन्कोडिस्कवर' से खून में बहुत कम मात्रा में मौजूद कैंसर कोशिकाओं को ढूंढा और गिना जा सकता है। इसके लिए खास तकनीक के साथ फ्लोरेसेंस माइक्रोस्कोप का इस्तेमाल होता है। जीन जांचों के साथ इसे इस्तेमाल करने पर कैंसर कोशिकाओं और उनसे जुड़े जीन बदलावों के बारे में पूरक जानकारी मिल सकती है।
डॉ. जयंत खंडारे के मार्गदर्शन में बनी 'ऑन्कोडिस्कवर' को केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन की मंजूरी मिल चुकी है। कंपनी का दावा है कि साधारण खून के नमूने से कैंसर कोशिकाएं ढूंढने के लिए मंजूरी पाने वाला यह भारत का पहला और एकमात्र मेडिकल परीक्षण है। कंपनी ने यह भी बताया कि यह तकनीक पंद्रह से ज्यादा तरह के ठोस कैंसर के लिए इस्तेमाल हो सकती है।
लिक्विड बायोप्सी के क्षेत्र के अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ प्रो. क्लाउस पैंटेल और प्रो. कैथरीन एलिक्स-पानाबिएर ने परिषद में इन तकनीकों को साथ इस्तेमाल करने की अहमियत बताई। प्रो. पैंटेल ने कहा कि कैंसर कोशिकाओं पर हुई रिसर्च का उपयोग नियामक मंजूरी पाने वाली तकनीक बनाने में किया गया। प्रो. एलिक्स-पानाबिएर ने कहा कि 'ऑन्कोडिस्कवर' और एनजीएस जांचों से मिलने वाली जानकारी को कैंसर के नियमित इलाज में ज्यादा असरदार तरीके से इस्तेमाल करने का मौका है।
डॉ. जयंत खंडारे ने साफ किया कि मेडिकल इमेजिंग जांचों में कैंसर न दिखे, तब भी खून में कैंसर की कुछ कोशिकाएं या जीन संकेत बचे हो सकते हैं। ऐसी कोशिकाओं की खोज और निगरानी आगे चलकर बीमारी के लौटने या दूसरे हिस्सों में फैलने का खतरा समझने में अहम हो सकती है।
डॉ. जयंत खंडारे और अरविंदन वासुदेवन ने 2013 में एक्टोरियस कंपनी की स्थापना की थी। यह कंपनी खून में कैंसर से जुड़े जैविक संकेत ढूंढने वाली तकनीक बनाने पर काम करती है। 'ऑन्कोडिस्कवर मेटास्टैट' नाम की प्रणाली फिलहाल रिसर्च के चरण में है।
एक्ट्रेक के सहयोग से हुई इस परिषद में डॉक्टरों और शोधकर्ताओं को चर्चा का मंच मिला। इसमें इस पर बात हुई कि खून के नमूने पर आधारित कोशिका जांच और जीन जांचों को साथ इस्तेमाल करने से कैंसर के निदान से लेकर इलाज की निगरानी तक कौन सी नई संभावनाएं बन सकती हैं।
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