बालिका दिवस: आज भी पढ़ाई, सेहत और बराबरी के लिए जूझ रही हैं लड़कियां
११ अक्टूबर को मनाए जाने वाले अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस पर लड़कियों के सामने खड़ी चुनौतियों और सरकारी योजनाओं पर एक नजर।
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२१वीं सदी को विज्ञान, टेक्नोलॉजी और आधुनिकता की सदी कहा जाता है। फिर भी दुनिया के कई हिस्सों में और हमारे अपने समाज में आज भी लड़कियों को बुनियादी हक, पढ़ाई, सेहत और बराबरी के मौके पाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। लड़कियां सिर्फ परिवार का सहारा नहीं हैं, वे पूरे देश की तरक्की की रीढ़ हैं। यही संदेश दुनिया भर में पहुंचाने के लिए हर साल ११ अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस पूरी संजीदगी के साथ मनाया जाता है। यह दिन सिर्फ रस्म अदायगी नहीं है। यह एक ऐसा मंच है, जहां लड़कियों की चुनौतियों से निपटने और उनके सपनों को उड़ान देने के लिए सब साथ आते हैं।
इस दिन की शुरुआत संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के एक अहम प्रस्ताव से हुई। महासभा ने १९ दिसंबर २०११ को यह प्रस्ताव पास किया, ताकि लड़कियों के हक और उनके सशक्तिकरण पर दुनिया भर में चर्चा हो सके। इसी प्रस्ताव के जरिए ११ अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस घोषित किया गया और २०१२ में पहला आधिकारिक बालिका दिवस मनाया गया। इस पहल की जड़ें १९९५ में बीजिंग में हुई महिलाओं पर विश्व सम्मेलन तक जाती हैं, जहां पहली बार लड़कियों के अधिकारों के लिए अलग कार्ययोजना बनाई गई थी। तब से हर साल यह दिन किसी एक खास थीम पर मनाया जाता है।
पढ़ाई की बात करें तो आज भी कई ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में लड़कियों को प्राथमिक शिक्षा पूरी करने से पहले ही स्कूल छोड़ना पड़ता है। गरीबी, सुरक्षा की कमी, घर की जिम्मेदारियां और बाल विवाह जैसी कुप्रथाएं उनकी तरक्की में बड़ी रुकावट बनती हैं। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में आज भी लाखों लड़कियां पढ़ाई से वंचित हैं। पढ़ाई का न होना सिर्फ एक लड़की का नुकसान नहीं है। यह पूरे समाज की आर्थिक और सामाजिक तरक्की को पीछे खींचता है। जब एक लड़की पढ़ती है, तो वह अपने साथ अपने पूरे परिवार और अगली पीढ़ी का भविष्य भी रोशन करती है।
पढ़ाई के साथ लड़कियों की सेहत और पोषण भी बेहद संवेदनशील मसला है। कुपोषण, एनीमिया और माहवारी की साफ-सफाई को लेकर झिझक के चलते कई लड़कियों की सेहत खतरे में पड़ जाती है। आज के डिजिटल दौर में लड़कियों को डिजिटल रूप से साक्षर बनाना भी उतना ही जरूरी है। ऑनलाइन पढ़ाई, डिजिटल हुनर और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में लड़कियों को पुरुषों के बराबर मौके मिलने चाहिए। डिजिटल जेंडर गैप घटाए बिना लड़कियां दुनिया के स्तर पर मुकाबला नहीं कर पाएंगी।
भारत में लड़कियों की सुरक्षा और भलाई के लिए केंद्र और राज्य सरकारें कई कल्याणकारी योजनाएं चला रही हैं। 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ', 'सुकन्या समृद्धि योजना' और लड़कियों की मुफ्त शिक्षा की योजनाओं की वजह से पिछले कुछ सालों में लिंग अनुपात और स्कूलों में लड़कियों के दाखिले में सकारात्मक बदलाव दिखा है। इसके अलावा बाल विवाह प्रतिबंध कानून और पीसीपीएनडीटी (PCPNDT) कानून से बेटी को बचाने का कानूनी ढांचा मजबूत हुआ है।
लेकिन सरकारी नीतियां और वैश्विक अभियान कितने भी चल जाएं, जब तक लोगों की सोच नहीं बदलती, पूरी बराबरी नहीं आ सकती। बेटे और बेटी के बीच का फर्क खत्म करके लड़कियों को अपने फैसले खुद लेने की आजादी दी जानी चाहिए। हर लड़की को अपना लक्ष्य पाने के लिए सुरक्षित और खुला माहौल देना हर माता-पिता, समाज और देश की जिम्मेदारी है। जब हम अपने घर की बेटी पर भरोसा करते हैं, तो वह आसमान छूने की ताकत जुटा लेती है।