स्कूल गए बिना भी दे सकते हैं सीबीएसई बोर्ड परीक्षा, जानिए प्राइवेट कैंडिडेट के नियम और फायदे
सीबीएसई हर साल उन विद्यार्थियों को प्राइवेट कैंडिडेट के तौर पर बोर्ड परीक्षा देने का मौका देता है जो नियमित स्कूल नहीं जाते। जानिए कौन भर सकता है फॉर्म, रेगुलर परीक्षा से क्या फर्क है और प्रमाणपत्र की कीमत कितनी है।
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
बोर्ड परीक्षा का नाम आते ही स्कूल की यूनिफॉर्म, सुबह की असेंबली और साल भर चलने वाली क्लास का नज़ारा आँखों के सामने आ जाता है। लेकिन कई विद्यार्थी स्कूल गए बिना, या नियमित क्लास में बैठे बिना, सीधे बोर्ड परीक्षा देते हैं। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) हर साल ऐसे विद्यार्थियों को 'प्राइवेट कैंडिडेट' के तौर पर परीक्षा देने का मौका देता है।
यह विकल्प उन हज़ारों विद्यार्थियों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है, जो किसी भी वजह से अपनी स्कूली पढ़ाई आगे जारी नहीं रख पाए, परीक्षा में फेल हो गए, या अपने पुराने नतीजे को बेहतर करना चाहते हैं। सीबीएसई की यह खास व्यवस्था बताती है कि शिक्षा के दरवाज़े किसी के लिए बंद नहीं होते। देश का कोई भी विद्यार्थी अपना भविष्य बनाने के लिए प्राइवेट कैंडिडेट के रूप में सीबीएसई बोर्ड परीक्षा दे सकता है।
विद्यार्थियों और पालकों के मन में इस परीक्षा को लेकर कई सवाल रहते हैं। फॉर्म कौन भर सकता है, यह रेगुलर बोर्ड परीक्षा से कैसे अलग है, और इसके नियम कितने कड़े हैं? प्राइवेट विद्यार्थियों को मुख्य धारा से जोड़ने के लिए सीबीएसई ने लचीले लेकिन अनुशासित नियम बनाए हैं। कोई विद्यार्थी किसी विषय में कंपार्टमेंट आने की वजह से अटका हो, अपने अंक सुधारना चाहता हो या पत्राचार से पढ़ाई पूरी करना चाहता हो, सबके लिए अलग-अलग श्रेणियाँ तय की गई हैं।
बोर्ड ने प्राइवेट उम्मीदवार के तौर पर परीक्षा देने के लिए कुछ खास वर्ग तय किए हैं। पहला वर्ग उन नियमित विद्यार्थियों का है जो पिछले साल की बोर्ड परीक्षा में एक या ज़्यादा विषयों में फेल हो गए थे। दूसरा वर्ग उनका है जिन्हें बोर्ड परीक्षा में कंपार्टमेंट आई थी और जो दोबारा परीक्षा देना चाहते हैं। तीसरा वर्ग उन विद्यार्थियों का है जो पहले ही पास हो चुके हैं, पर अपना प्रतिशत या अंक सुधारना चाहते हैं।
चौथा वर्ग उन विद्यार्थियों का है जो एक और नया विषय पास करके अपनी योग्यता बढ़ाना चाहते हैं। पाँचवाँ वर्ग शारीरिक रूप से विकलांग विद्यार्थियों का है, जो दूसरे क्षेत्रों से नियम के मुताबिक स्कूल गए बिना परीक्षा देना चाहते हैं।
रेगुलर और प्राइवेट परीक्षा के पैटर्न में भी कुछ फर्क हैं। रेगुलर विद्यार्थियों के लिए स्कूल जाना और प्रैक्टिकल क्लास में हाज़िर रहना ज़रूरी होता है, जबकि प्राइवेट विद्यार्थियों को स्कूल जाने की ज़रूरत नहीं होती। रेगुलर विद्यार्थियों के इंटरनल अंक स्कूल के प्रोजेक्ट और टेस्ट के आधार पर जोड़े जाते हैं, वहीं प्राइवेट विद्यार्थियों के लिए थ्योरी पेपर के अंक ही मुख्य आधार होते हैं।
आवेदन की प्रक्रिया भी अलग है। स्कूल रेगुलर विद्यार्थियों के फॉर्म खुद भरते हैं, लेकिन प्राइवेट विद्यार्थियों को सीबीएसई की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर खुद ऑनलाइन आवेदन करना पड़ता है।
प्राइवेट परीक्षा देने के पीछे कई व्यावहारिक कारण होते हैं। सबसे बड़ा कारण यह है कि अगर कोई विद्यार्थी निजी समस्या, सेहत की वजह या फेल होने के चलते पढ़ाई बीच में छोड़ बैठा हो, तो वह अपना पूरा साल या करियर गँवाए बिना प्राइवेट परीक्षा दे सकता है। इसके अलावा जिन युवाओं को सरकारी नौकरी या ऊँची पढ़ाई के लिए अपने अंक बढ़ाने होते हैं, उनके लिए 'इम्प्रूवमेंट' का रास्ता बहुत काम का साबित होता है।
अक्सर पूछा जाता है कि क्या प्राइवेट सर्टिफिकेट की कीमत कम होती है। इसका सीधा जवाब है, बिलकुल नहीं। सीबीएसई की ओर से जारी मार्कशीट और पासिंग सर्टिफिकेट रेगुलर और प्राइवेट, दोनों श्रेणी के विद्यार्थियों के लिए एक जैसा होता है। उस पर कहीं यह नहीं लिखा होता कि आपने प्राइवेट परीक्षा पास की है। देश के किसी भी कॉलेज, यूनिवर्सिटी या सरकारी विभाग में यह प्रमाणपत्र पूरी तरह मान्य होता है।