बालिका दिवस पर बाल विवाह के खिलाफ आवाज, UN का आंकड़ा: हर 3 सेकंड में एक लड़की
अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस पर बाल विवाह की चुनौती और मानसिकता बदलने की जरूरत पर एक रिपोर्ट।
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दुनिया के कई हिस्सों में छोटी उम्र की बच्चियों को स्कूल भेजने के बजाय घर-परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर डाल दी जाती है। उनसे उनकी मर्जी नहीं पूछी जाती। बाल विवाह सिर्फ कम उम्र में होने वाला सामाजिक बंधन नहीं है। यह एक मासूम का बचपन, उसकी पढ़ाई, उसकी सेहत और फैसले लेने का हक छीन लेने वाली सबसे बड़ी दीवार है। हर साल 11 अक्टूबर को मनाया जाने वाला अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस इसी सच्चाई की तरफ ध्यान खींचता है।
इस साल के अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस की थीम है, 'बाल विवाह खत्म करो और लड़कियों के अधिकारों में निवेश करो।' संयुक्त राष्ट्र के आंकड़े डराने वाले हैं। पूरी दुनिया में हर साल 1 करोड़ 20 लाख से ज्यादा लड़कियों की शादी 18 साल की उम्र से पहले ही कर दी जाती है। यानी हर 3 सेकंड में एक लड़की का बचपन जबरदस्ती बड़ों की दुनिया में धकेल दिया जाता है। इससे साफ है कि सख्त कानूनों के बावजूद यह कुप्रथा आज समाज के माथे पर बड़ा कलंक बनी हुई है।
रिपोर्ट के मुताबिक बाल विवाह को सिर्फ गरीबी या पुरानी परंपराओं से जोड़कर देखना काफी नहीं है। कम उम्र की शादी लड़कियों का भविष्य छीन लेती है, उन्हें आर्थिक रूप से दूसरों पर निर्भर बना देती है और अक्सर मातृत्व या घरेलू हिंसा जैसे खतरों में धकेल देती है। इस दलदल से बचाने के लिए सिर्फ फेरे रुकवाना काफी नहीं है। असली मुश्किल तब शुरू होती है जब शादी रुकने के बाद उस लड़की की जिंदगी को नई दिशा देनी पड़ती है। क्या वह स्कूल जा सकी? क्या उसे अपने पैरों पर खड़े होने का मौका मिला?
बाल विवाह के इस नासूर के खिलाफ दुनिया भर की लड़ाई में भारत भी आगे है। बच्चों के हक के लिए लंबे समय से आवाज उठाने वाले जाने-माने वकील भुवन रिभु, जो जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के संस्थापक हैं, ने संयुक्त राष्ट्र के मंच पर बाल विवाह के खात्मे के लिए एक समर्पित अंतरराष्ट्रीय दिवस तय करने की मांग की थी। उनके अभियान और कई देशों के सहयोग के नतीजे में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने हर साल 27 नवंबर को बाल और जबरन विवाह के खिलाफ 'अंतरराष्ट्रीय दिवस' के रूप में मनाने का प्रस्ताव मंजूर कर लिया है।
इस बारे में वकील भुवन रिभु कहते हैं, "बाल संरक्षण को सिर्फ किसी अपराध के खिलाफ कार्रवाई के तौर पर नहीं देखा जा सकता। इसके लिए नीति, संस्थागत व्यवस्था, अधिकारियों की क्षमता, समुदायों की भागीदारी, आर्थिक उपाय और तकनीक, सबका एक साथ इस्तेमाल करना होगा। कानून का असली मकसद सिर्फ सजा देना नहीं, बल्कि बच्चों को सुरक्षित भविष्य देना है।"
अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस का संदेश बिल्कुल साफ है कि किसी भी लड़की की किस्मत उसकी उम्र या उसका लिंग तय नहीं कर सकता। बाल विवाह का अंत तभी मुमकिन है जब हम उस घिसी-पिटी सोच को बदलें, जो एक लड़की के सपनों से ज्यादा उसकी शादी को अहम मानती है। जब लड़की के हाथ में किताबें होंगी और आंखों में आसमान छूने के सपने होंगे, तभी समाज का सच्चा विकास हो सकेगा।