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14:27 IST

रात की शिफ्ट में खाना कब खाएं: हैदराबाद के डायटीशियन विनय कुमार नेवतिया का नज़रिया

हैदराबाद के IT कर्मचारियों पर 2025 के एक अध्ययन के आंकड़ों के बीच डायटीशियन विनय कुमार नेवतिया बताते हैं कि रात की शिफ्ट वालों के खाने की योजना वे किस तरह बनाते हैं।

रात की शिफ्ट में खाना कब खाएं: हैदराबाद के डायटीशियन विनय कुमार नेवतिया का नज़रिया तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

हैदराबाद के IT हब में 2025 में 345 कर्मचारियों पर एक अध्ययन हुआ। इनमें से 89 लोग सुबह 9 से शाम 5 बजे की आम शिफ्ट के बाहर काम करते थे और 241 ने बताया कि वे रोज़ सात घंटे से कम सोते हैं। हैदराबाद के डायटीशियन विनय कुमार नेवतिया रोज़मर्रा के भारतीय खाने के हिसाब से डाइट प्लान बनाते हैं। उनके पास ऐसे लोग बार-बार एक ही सवाल लेकर आते हैं: डिनर आखिर कब करें?

नेवतिया कहते हैं, "ज़्यादातर डाइट सलाह मानकर चलती है कि दिन सात बजे शुरू होता है। नाश्ता, लंच, डिनर, फिर सोना। क्लाइंट शिफ्ट वाला कोई पूछे कि रात के 2 बजे डिनर का क्या मतलब है, तो मेरे पास साफ-सुथरा नियम नहीं होता। मुझे नहीं लगता कि किसी के पास पूरा जवाब है।"

रिसर्च क्या कहती है, इस पर वे सावधानी से बात करते हैं। 2015 के एक मेटा-एनालिसिस में 12 ऑब्ज़र्वेशनल स्टडी के 2,26,652 प्रतिभागियों को जोड़ा गया। इसमें कभी शिफ्ट में काम कर चुके लोगों के लिए डायबिटीज़ का ऑड्स रेशियो 1.09 निकला (95 प्रतिशत कॉन्फिडेंस इंटरवल 1.05 से 1.12)। लेखकों ने इसे एक जुड़ाव बताया है। वे चीन के हैं और सार में भारत का अलग आंकड़ा नहीं है। लोडेन और उनके साथियों के एक और अध्ययन के मुताबिक शिफ्ट वर्कर्स की कुछ मेटाबॉलिक दिक्कतें खाने की क्वालिटी और खाने के बेतरतीब वक्त से जुड़ी हो सकती हैं। तनाव, बिगड़ी हुई बॉडी क्लॉक, नींद की कमी, कम हरकत और कम आराम की भी भूमिका होने की संभावना है।

नेवतिया के शब्दों में, "ऐसा अनुपात भीड़ के बारे में बताता है। यह रात की शिफ्ट के खाने को गंभीरता से लेने की वजह है, मेरे सामने बैठे इंसान पर फैसला नहीं।"

टाइमिंग पर सबसे सीधा टेस्ट और छोटा है। अमेरिका की एक लैब में रैंडमाइज़्ड स्टडी हुई, जिसमें 18 से 35 साल के 19 सेहतमंद वयस्कों ने 14 दिन का प्रोटोकॉल किया, जिसमें नकली रात की ड्यूटी भी थी। जिन्होंने रात के शेड्यूल में खाया, उनका टेस्ट मील के बाद ब्लड शुगर रिस्पॉन्स अपने बेसलाइन से 19.4 प्रतिशत बढ़ा (95 प्रतिशत कॉन्फिडेंस इंटरवल 4.7 से 34.2 प्रतिशत)। जिनका खाना सिर्फ दिन के घंटों तक सीमित रहा, उनमें बदलाव अहम नहीं था। लेखकों का कहना है कि असली शिफ्ट वर्कर्स पर अध्ययन अब भी चाहिए। क्या वे सिर्फ 19 लोगों के आधार पर रात की शिफ्ट वाले को दिन में ही खाने को कहेंगे? नेवतिया का जवाब है, "नहीं। मैंने नहीं देखा कि गचीबौली के फ्लैट में, परिवार, प्रेशर कुकर और 8.40 की कैब के बीच यह कैसा दिखता है।"

सरकारी सलाह पर वे दो दस्तावेज़ अलग-अलग रखते हैं। ICMR-राष्ट्रीय पोषण संस्थान की भारतीयों के लिए डाइटरी गाइडलाइंस में दिन में दो से तीन बार खाने और बीच में स्नैकिंग न करने की बात है। सेहतमंद थाली में भरपूर सब्ज़ियां, पर्याप्त साबुत अनाज और दालें, थोड़े मेवे या बीज, कुछ फल और सादा दही बताया गया है, जबकि चीनी, तेल और नमक कम हों। अमेरिका के CDC की संस्था NIOSH का नाइट-शिफ्ट नर्सों के लिए एक पेज कहता है कि आधी रात से सुबह 6 बजे के बीच खाना टालें या कम करें, 24 घंटे में तीन बार खाएं (एनर्जी गिरे तो ज़्यादा बार), और जागे रहना ज़रूरी हो तब चीनी वाले और कम फाइबर वाले कार्बोहाइड्रेट से बचें, क्योंकि उसके मुताबिक इनसे नींद बढ़ सकती है। यह विदेशी सलाह है और नर्सों के लिए लिखी गई है।

नेवतिया कहते हैं, "'आठ के बाद मत खाओ' वाली सलाह से मैं सबसे ज़्यादा असहमत हूं। यह उसके लिए लिखी गई है जो दस बजे तक सो जाता है। रात 9 बजे की शिफ्ट में आधी रात से छह बजे का नियम मानें तो काम की आधी रात खाली निकल जाती है। कुछ लोग निभा लेते हैं, बहुत से नहीं निभा पाते। दोनों दस्तावेज़ों से मैं घड़ी का वक्त नहीं, ढांचा लेता हूं: कुछ तय मील। हो सकता है मैं इसमें गलत होऊं।"

रात के 2 बजे प्लेट में क्या हो, इस पर वे पूछते हैं कि आप 3 बजे असल में क्या खाएंगे। उनके मुताबिक दाल, सब्ज़ी, गेहूं या बाजरे की रोटी, दही, और वक्त हो तो मूंग का पेसरट्टू ठीक रहता है। जिस सलाद बॉक्स के लिए प्लान और कांटा चाहिए, वह हफ्ता नहीं निकाल पाता। चाय पर उन्हें कप की गिनती से ज़्यादा फिक्र यह है कि उसके साथ क्या है। ईरानी चाय के साथ पैकेट बिस्कुट वाली आदत पर वे नज़र डालेंगे।

वे यह भी याद दिलाते हैं कि राष्ट्रीय गाइडलाइंस हैदराबाद में ही तैयार होती हैं, ICMR-NIN तारनाका से इन्हें छापता है। उसी दस्तावेज़ में बाहर के खाने को एक खाने में नहीं गिना गया। स्ट्रीट फूड को आमतौर पर सेहतमंद और ताज़ा बताया गया है, साथ में स्वच्छता को लेकर चेतावनी है। ज़्यादातर ऑर्डर पर बनने वाला फास्ट फूड ताज़ा बताया गया है, लेकिन मिल्कशेक, चिप्स, पिज़्ज़ा, बर्गर और फ्राइज़ जैसी चीज़ों को फैट, चीनी, नमक या ज़्यादा प्रोसेसिंग की वजह से अनहेल्दी कहा गया है।

नेवतिया हर योजना इंसान की अपनी घड़ी से बनाते हैं: कब सोता है, कमुट कितना लंबा है, कैब कब निकलती है, कैंटीन कब बंद होती है, रात 1 बजे डिलीवरी ऐप पर क्या दिखता है। वे सोने के वक्त के आसपास दो-तीन मुख्य मील तय करते हैं, फिर पूछते हैं कि जिस रात ये बिगड़ जाएं तब क्या होगा। बिरयानी पर पाबंदी नहीं है, वे यह पूछते हैं कि उसके साथ क्या आता है और कब। उनके मुताबिक "बाहर कभी मत खाओ" वाला नियम उस शिफ्ट में नहीं टिकता जहां कैंटीन आधी रात को बंद हो जाती है।

इस सबमें ज़्यादातर बातें जुड़ाव और छोटे सैंपल पर टिकी हैं, या दूसरे पेशों के लिए लिखी गाइडलाइंस पर। शुरुआत में बताया गया हैदराबाद का अध्ययन क्रॉस-सेक्शनल था। उसके लेखकों के मुताबिक 85.2 प्रतिशत सैंपल पुरुषों का था, व्यवहार की जानकारी खुद लोगों ने दी थी जिसकी पुष्टि नहीं हो सकती, चयन और जानकारी का पूर्वाग्रह संभव है, और कारण-असर साबित करने के लिए लॉन्गिट्यूडिनल अध्ययन चाहिए।

नेवतिया के मुताबिक कोई भी बात किसी मेडिकल कंडीशन वाले को यह नहीं बताती कि मंगलवार की रात क्या करना है। घूमते रोस्टर में कोई एक सोने की खिड़की नहीं होती, इसलिए वहां प्लान सबसे मुश्किल है। दवा या इंसुलिन के वक्त से बंधा खाना, गर्भावस्था और खाने के विकार का इतिहास, हर एक सवाल बदल देता है। आखिरी पर वे साफ कहते हैं कि आधी रात से छह बजे तक न खाने का नियम बिल्कुल गलत हो सकता है।

उनके हिसाब से रात की शिफ्ट का प्लान तभी गिना जाएगा जब वह चौथी रात टिके, जब कैब लेट हो, कैंटीन बंद हो और डब्बे की दाल ठंडी हो चुकी हो। वे कहते हैं, "ठंडी दाल वाला प्लान बिना भविष्य का प्लान है, और ऐसे कुछ मैंने भी लिखे हैं।" जो प्लान पास होते हैं वे अक्सर नीरस होते हैं: वही कुछ रोज़ के भारतीय खाने, कैब आने से पहले पैक किए हुए।

यह सामान्य जानकारी है, मेडिकल सलाह नहीं। डायबिटीज़ वाले, गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाएं, नियमित दवा लेने वाले और खाने के विकार का इतिहास रखने वाले लोग खाने का वक्त या चीज़ें बदलने से पहले किसी योग्य डॉक्टर या डायटीशियन से सलाह लें।

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