दिल्ली के सरकारी मेडिकल कॉलेज के 406 MBBS छात्रों पर स्टडी, 77% में मध्यम से ज्यादा तनाव
इंडियन हार्ट जर्नल में छपी स्टडी के मुताबिक नई दिल्ली के एक सरकारी मेडिकल कॉलेज के MBBS छात्रों में तनाव का स्तर ऊंचा पाया गया।
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नई दिल्ली के एक सरकारी मेडिकल कॉलेज में MBBS पढ़ रहे छात्रों पर हुई एक नई स्टडी में तनाव को लेकर चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। यह स्टडी इंडियन हार्ट जर्नल (Indian Heart Journal) में प्रकाशित हुई है। इसमें पाया गया कि 77 प्रतिशत छात्र मध्यम से उच्च स्तर के तनाव में हैं।
इस रिसर्च में MBBS के चारों सालों के कुल 406 छात्रों को शामिल किया गया था। सभी छात्र 18 से 25 साल की उम्र के थे। स्टडी में तनाव की वजहें भी गिनाई गई हैं। परीक्षा में अच्छे नंबर लाने की फिक्र, कम नंबर आने का डर और टीचरों के सवालों का जवाब न दे पाने का डर छात्रों के तनाव की मुख्य वजहें निकलीं।
स्टडी के मुताबिक 54.43 प्रतिशत छात्रों ने बताया कि उन्हें मध्यम स्तर का तनाव है। वहीं 22.66 प्रतिशत छात्र उच्च तनाव की हालत में थे। करीब 22.9 प्रतिशत छात्रों में हल्का तनाव दिखा। यानी तीन चौथाई से ज्यादा छात्र मध्यम या उच्च तनाव के साथ पढ़ाई कर रहे हैं।
स्टडी में सामने आया कि पढ़ाई में लगातार बेहतरीन प्रदर्शन करने का दबाव छात्रों के लिए सबसे बड़ी परेशानी बना हुआ है। इसके अलावा टीचरों के सवालों के जवाब न दे पाना, उम्मीद से कम नंबर आना और बहुत बड़े सिलेबस को वक्त पर पूरा करने की टेंशन भी उन्हें बार-बार बेचैन करती है। कई छात्रों को यह भी लगता है कि उनकी मेहनत को सही कद्र या पहचान नहीं मिलती।
अलग-अलग सालों के हिसाब से देखें तो MBBS के दूसरे साल के छात्रों में उच्च तनाव का प्रतिशत सबसे ज्यादा, यानी 30.11 प्रतिशत दर्ज किया गया। हालांकि रिसर्चरों के मुताबिक अलग-अलग बैच के छात्रों की जीवनशैली में फर्क की वजह से ऐसा दिखा हो सकता है। इसलिए इससे सीधे यह नतीजा नहीं निकाला जा सकता कि मेडिकल की पूरी पढ़ाई के दौरान तनाव बढ़ता ही जाता है। इस स्टडी में छात्रों के तनाव और हार्ट रेट वैरिएबिलिटी (HRV) के आपसी रिश्ते को भी परखा गया।
स्टडी के मुख्य लेखक डॉ. मोहित गुप्ता के मुताबिक छात्रों से सिर्फ यह पूछ लेना कि वे तनाव में हैं या नहीं, कभी काफी नहीं होता। उनका कहना है कि मेडिकल शिक्षा में तनाव का व्यवस्थित तरीके से आकलन करने के साथ-साथ उससे निकलने और उसे संभालने की रणनीतियों को भी कोर्स में शामिल करना बहुत जरूरी है।
डॉ. गुप्ता ने मेडिकल शिक्षा को ज्यादा समावेशी, व्यावहारिक और संतुलित बनाने पर जोर दिया है, ताकि छात्रों को पढ़ाई के साथ मनोरंजन और दूसरी कलाओं के लिए भी जगह मिल सके। उनके मुताबिक छात्रों को सिर्फ पढ़ाई में मजबूत बनाना काफी नहीं है, उन्हें भावनात्मक रूप से स्थिर रखना भी उतना ही जरूरी है, ताकि जरूरत पड़ने पर वे सही मदद ले सकें और तनाव का अच्छे से सामना कर सकें।