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10:38 IST

अभिनेता नाना पाटेकर का 75 की उम्र में निधन, गोवा के घर में आया तेज हार्ट अटैक

मराठी और हिंदी फिल्मों के दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का 8 अक्टूबर 2026 को गोवा में निधन हो गया। 35 रुपये महीने की कमाई से शुरू हुआ उनका सफर पद्मश्री तक पहुंचा।

अभिनेता नाना पाटेकर का 75 की उम्र में निधन, गोवा के घर में आया तेज हार्ट अटैक तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

मराठी और हिंदी फिल्मों के वरिष्ठ अभिनेता नाना पाटेकर का 8 अक्टूबर 2026 को 75 साल की उम्र में निधन हो गया। गोवा में अपने घर पर उन्हें हार्ट अटैक का तेज दौरा पड़ा। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों की कोशिशों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। उनके जाने से भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में शोक की लहर है।

नाना पाटेकर का असली नाम विश्वनाथ पाटेकर था। उनका जन्म 1 जनवरी 1951 को रायगड जिले के मुरुड-जंजिरा में हुआ था। एक्टिंग के साथ-साथ वे लेखक, डायरेक्टर और फिल्म प्रोड्यूसर के तौर पर भी जाने गए। अपने लंबे करियर में उन्होंने हिंदी और मराठी फिल्मों को कई यादगार किरदार दिए।

उनकी शुरुआती जिंदगी बहुत मुश्किलों भरी थी। सिर्फ 13 साल की उम्र से उन्होंने काम करना शुरू कर दिया था। गरीबी और बुरे हालात से लड़ते हुए उन्होंने अपना सफर शुरू किया। आगे चलकर इसी संघर्ष ने उनकी शख्सियत और उनकी एक्टिंग को अलग धार दी।

एक पॉडकास्ट में अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए नाना पाटेकर ने बताया था कि उस वक्त उनकी महीने की कमाई सिर्फ 35 रुपये थी। हालात इतने कठिन थे कि कई बार दिन में केवल एक बार खाना नसीब होता था। फिर भी इन मुश्किलों ने उनका हौसला कम नहीं होने दिया।

उन्होंने 1978 में आई फिल्म 'गमन' से एक्टिंग की दुनिया में कदम रखा। शुरुआत में उन्होंने अलग-अलग तरह के रोल किए। धीरे-धीरे उनकी एक्टिंग का अपना अंदाज और डायलॉग बोलने का ढंग दर्शकों की नजर में आने लगा। 1986 में रिलीज हुई 'अंकुश' ने उन्हें बड़ी पहचान दिलाई।

इसके बाद 'परिंदा', 'क्रांतिवीर', 'अग्निसाक्षी', 'तिरंगा', 'खामोशी' और 'नटसम्राट' जैसी फिल्मों में उन्होंने अपनी ताकत साबित की। भारी आवाज, डायलॉग की अदायगी, गुस्से वाले हाव-भाव और किरदार में पूरी तरह घुल जाना उनकी खास पहचान बन गई।

उन्हें 3 राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और 4 फिल्मफेयर अवॉर्ड मिले। 'परिंदा' के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और फिल्मफेयर दोनों मिले। 'क्रांतिवीर' में अपनी एक्टिंग के लिए भी उन्होंने राष्ट्रीय पुरस्कार के साथ फिल्मफेयर जीता। 'अग्निसाक्षी' के लिए भी उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया। साल 2013 में भारत सरकार ने फिल्म और कला के क्षेत्र में योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया।

नाना पाटेकर सिर्फ अभिनेता नहीं थे। उन्होंने लेखन और डायरेक्शन में भी काम किया। 'प्रहार: द फाइनल अटैक' के जरिए उन्होंने डायरेक्शन की जिम्मेदारी भी संभाली। 'शागिर्द', 'टैक्सी नंबर 9211' और 'अब तक छप्पन' जैसी फिल्मों में उनके रोल खास तौर पर पसंद किए गए। पुलिस अफसर, अपराधी, नेता या आम आदमी, हर तरह के किरदार उन्होंने पर्दे पर असरदार ढंग से निभाए।

सेना से उनका रिश्ता भी उनकी जिंदगी का अहम हिस्सा था। उन्होंने 1990 में इंडियन टेरिटोरियल आर्मी जॉइन की। 'प्रहार: द फाइनल अटैक' में मेजर का रोल और बेहतर ढंग से निभाने के लिए उन्होंने भारतीय सेना के साथ ट्रेनिंग ली थी। उन्होंने बताया था कि यह ट्रेनिंग पूरे 3 साल की थी। इस दौरान उन्होंने जनरल वी. के. सिंह के साथ भी काम किया था।

1999 में कारगिल युद्ध शुरू हुआ तो नाना पाटेकर ने सिर्फ पर्दे पर देशभक्ति का किरदार नहीं निभाया, बल्कि सीधे फौज के साथ काम करने का फैसला लिया। वे कुछ समय एक्टिंग से दूर रहे और मराठा लाइट इन्फैंट्री के साथ कारगिल में सेवा की। अगस्त 1999 में उन्होंने नियंत्रण रेखा के पास के इलाके में 2 हफ्ते से ज्यादा वक्त बिताया। वे क्विक रिस्पॉन्स टीम का हिस्सा थे और कुछ दिन बेस हॉस्पिटल में भी काम किया। उन्होंने बताया था कि उस कठिन दौर में उनका वजन 76 किलो से घटकर 56 किलो रह गया था।

निजी जिंदगी में माता-पिता का उनके लिए बहुत बड़ा स्थान था। उनके पिता का नाम गजानन पाटेकर और मां का नाम निर्मला पाटेकर बताया गया है। पिता कारोबारी थे। नाना पाटेकर जब सिर्फ 28 साल के थे, तब पिता का निधन हो गया। उसके बाद मां के साथ उनका रिश्ता बेहद करीबी रहा। मां निर्मला पाटेकर का 29 जनवरी 2019 को 99 साल की उम्र में निधन हुआ।

बहुत कठिन हालात से शुरुआत करके नाना पाटेकर ने भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पक्की जगह बनाई। करोड़ों की दौलत और बड़ी कामयाबी के बावजूद उनके सादे रहन-सहन और जमीन से जुड़ाव की हमेशा चर्चा होती रही। 35 रुपये की कमाई से शुरू हुआ उनका सफर राष्ट्रीय पुरस्कार, फिल्मफेयर और पद्मश्री तक पहुंचा। पर्दे की असरदार एक्टिंग के साथ सेना की सेवा और कारगिल में उनके योगदान ने उन्हें सिर्फ एक अभिनेता तक सीमित नहीं रहने दिया। 75 साल की उम्र में उनके निधन से हिंदी और मराठी फिल्म इंडस्ट्री ने एक बेमिसाल कलाकार खो दिया है। उनकी दमदार आवाज, अलग अंदाज की डायलॉग डिलीवरी और निभाए गए अनगिनत किरदार दर्शकों को हमेशा याद रहेंगे।

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