पुराणकथा: वैकुंठ के द्वारपाल जय-विजय ही थे रावण और कुंभकर्ण, तीन जन्मों की कहानी
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हिंदू पुराणपरंपरा की एक कथा के मुताबिक रावण पहले वैकुंठ में भगवान विष्णु के द्वारपालों में से एक था। शाप के कारण जय-विजय को तीन बार असुर कुल में जन्म लेना पड़ा।
रामायण की कहानियों से रावण को तो सब जानते हैं। राम और रावण के किस्से हम बचपन से ही सुनते आए हैं। लेकिन पुराणकथाओं के मुताबिक रावण पहले वैकुंठ में भगवान विष्णु के द्वारपालों में से एक था। हिंदू पुराणपरंपरा में एक कथा सुनाई जाती है कि भगवान विष्णु के दर्शन के लिए उसे तीन बार असुर कुल में जन्म लेना पड़ा।
जय-विजय को मिला शाप: इस कथा के अनुसार वैकुंठ में भगवान विष्णु के दरवाजे की रखवाली जय और विजय नाम के दो द्वारपाल करते थे। एक दिन सनक, सनंदन, सनातन और सनत्कुमार, ये चार छोटी उम्र के ऋषि भगवान विष्णु के दर्शन के लिए वैकुंठ पहुंचे। जय-विजय ने उन्हें अंदर जाने से रोक दिया। इससे ऋषि गुस्सा हो गए और उन्होंने दोनों द्वारपालों को पृथ्वी पर जन्म लेने का शाप दे दिया।
भगवान विष्णु ने इस शाप से निकलने के दो रास्ते बताए। पहला रास्ता था सात जन्म तक भक्त बनकर पृथ्वी पर रहना, और दूसरा तीन जन्म तक भगवान विष्णु के दुश्मन के रूप में जन्म लेना। अपने आराध्य देव से लंबे समय तक दूर न रहना पड़े, इसलिए जय-विजय ने तीन जन्मों वाला रास्ता चुना।
पहले जन्म में जय-विजय हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु नाम के असुरों के रूप में पैदा हुए। हिरण्याक्ष का वध भगवान विष्णु ने वराह अवतार में किया, जबकि हिरण्यकशिपु का वध भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए लिए गए नरसिंह अवतार में हुआ।
रावण और कुंभकर्ण थे दूसरा जन्म: दूसरे जन्म में जय-विजय ने रावण और कुंभकर्ण के रूप में जन्म लिया। रावण लंका का राजा था और कुंभकर्ण उसका भाई था। इस जन्म में भगवान विष्णु ने श्रीराम के रूप में अवतार लिया और रावण का वध किया। इस कथा में कहा गया है कि रामायण का रावणवध सिर्फ अधर्म पर धर्म की जीत नहीं है, बल्कि जय-विजय को शाप से मुक्त करने का हिस्सा भी है।
तीसरे जन्म में कौन थे जय-विजय: भागवत पुराण में वर्णन है कि जय-विजय का तीसरा जन्म शिशुपाल और दंतवक्र के रूप में हुआ। शिशुपाल श्रीकृष्ण का विरोधी था। राजसूय यज्ञ के समय श्रीकृष्ण ने उसका वध किया। पुराणकथा में यह भी बताया जाता है कि दंतवक्र का वध भी श्रीकृष्ण ने ही किया। इन तीन जन्मों के बाद जय-विजय शाप से मुक्त हो गए और उन्हें फिर से वैकुंठ में भगवान विष्णु की सेवा में लौटने का मौका मिला।
इस कथा से एक अलग आध्यात्मिक सोच सामने आती है। रावण जैसे पात्र को सिर्फ खलनायक के तौर पर नहीं, बल्कि एक बड़े दैवी कथानक के हिस्से के रूप में भी देखा जाता है। हालांकि यह जानकारी हिंदू पुराणपरंपरा की कथाओं पर आधारित है। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि रामायण के अलग-अलग संस्करणों में ब्योरे अलग-अलग मिल सकते हैं।
कुछ सवाल-जवाब: क्या रावण वैकुंठ का द्वारपाल था? भागवत पुराण की कथा के मुताबिक रावण वैकुंठ के द्वारपाल जय का दूसरा जन्म था। कहा जाता है कि विजय ने कुंभकर्ण के रूप में जन्म लिया।
जय-विजय को शाप किसने दिया था? सनक, सनंदन, सनातन और सनत्कुमार, इन चार ऋषियों ने वैकुंठ में प्रवेश रोके जाने की वजह से जय-विजय को पृथ्वी पर जन्म लेने का शाप दिया था।
जय-विजय ने कौन से तीन जन्म लिए? पुराणकथा में बताया गया है कि पहले जन्म में हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु, दूसरे जन्म में रावण और कुंभकर्ण, और तीसरे जन्म में शिशुपाल और दंतवक्र उनके रूप थे।
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