उर्वशी ने अर्जुन को दिया शाप, बाद में अज्ञातवास में वही बना बचाव की ढाल
महाभारत के उर्वशी और अर्जुन प्रसंग में प्रेम, नकार, स्वाभिमान, शाप और नियति एक साथ दिखते हैं।
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
उर्वशी का नाम आते ही स्वर्ग की सुंदरता, अनोखे रूप और मोहक व्यक्तित्व की तस्वीर सामने आ जाती है। हिंदू पुराणपरंपरा में उर्वशी को स्वर्ग की श्रेष्ठ अप्सराओं में गिना जाता है। उसकी सुंदरता के किस्से कई ग्रंथों में मिलते हैं। लेकिन महाभारत में अर्जुन और उर्वशी का प्रसंग सिर्फ सुंदरता और आकर्षण की कहानी नहीं है। इसमें प्रेम, नकार, स्वाभिमान, धर्म, मर्यादा, गुस्सा, शाप और नियति सब बारीकी से गुंथे हुए दिखते हैं।
अगर इस कथा को सिर्फ इतना मानकर देखा जाए कि उर्वशी ने अर्जुन से प्रेम जताया और अर्जुन ने मना कर दिया, तो इसका बड़ा मतलब छूट जाता है। इस प्रसंग से इंसानी मन के कई पहलू सामने आते हैं: प्रेम जताने का हक, नकार को मानने की ताकत, भावनाओं पर काबू, फर्ज और निजी चाहत के बीच टकराव, और यह कि जो चीज़ कभी मुसीबत लगती है, वह आगे चलकर वरदान कैसे बन जाती है।
उर्वशी इंद्र की स्वर्गसभा की प्रमुख अप्सराओं में से एक थी। उसकी सुंदरता, नृत्यकला और मोहक व्यक्तित्व की वजह से उसे खास जगह मिली थी। पुराणपरंपरा में उर्वशी और राजा पुरुरवा की प्रेमकथा भी मशहूर है। इसलिए उर्वशी का नाम सिर्फ स्वर्ग की सुंदरता से नहीं, प्रेम और भावनाओं से भी जुड़ा है। महाभारत में उसकी भूमिका एक अलग संदर्भ में आती है। यहां वह सिर्फ मोहक अप्सरा नहीं दिखती, बल्कि ऐसी शख्सियत के रूप में सामने आती है जो अपनी भावनाओं को लेकर साफ है और चाहती है कि उसकी इच्छा कबूल की जाए।
पांडवों के वनवास के दौरान अर्जुन ने दिव्य अस्त्र पाने के लिए कड़ी तपस्या की। उसके पराक्रम और तप से प्रसन्न होकर उसे दिव्य अस्त्र मिले। इसके बाद इंद्र ने अर्जुन को स्वर्ग बुलाया। वहां अर्जुन को सिर्फ शस्त्रविद्या ही नहीं मिली, कई कलाओं की शिक्षा भी मिली। गंधर्व चित्रसेन के जरिए उसने नृत्य और संगीत का ज्ञान लिया। आगे अज्ञातवास में इसी ज्ञान का काम पड़ने वाला था, इसकी खबर उस वक्त अर्जुन को भी नहीं थी।
स्वर्ग में रहने के इसी दौरान उर्वशी और अर्जुन की मुलाकात हुई। अर्जुन का तेजस्वी व्यक्तित्व, शौर्य और रूप देखकर उर्वशी उसकी ओर खिंच गई और उसने अपना प्रेम जता दिया। स्वर्ग की अप्सराओं की जीवनशैली के हिसाब से उसके लिए यह असामान्य नहीं था। उसकी नज़र में उसकी भावनाएं स्वाभाविक थीं और वह चाहती थी कि अर्जुन भी वैसी ही भावना से उसे अपनाए। पर अर्जुन का नज़रिया बिल्कुल अलग था।
अर्जुन ने उर्वशी को स्त्री के रूप में देखने के बजाय अपनी वंशपरंपरा से जोड़कर देखा। पुरुरवा चंद्रवंश में अर्जुन का पूर्वज था और उर्वशी का रिश्ता पुरुरवा से था, इसलिए अर्जुन ने उसे माता के समान माना। उसके मन में उर्वशी के लिए न कोई अपमान था, न तिरस्कार। उसके लिए यह धर्म और मर्यादा का सवाल था। उसने उर्वशी से कहा कि वह उसके पूर्वज से जुड़ी है, इसलिए उसके लिए माता समान है, और ऐसे में उसका प्रेम कबूल करना उसे ठीक नहीं लगता।
उर्वशी यह नकार मान नहीं पाई। उसने अपनी भावना साफ-साफ जताई थी, इसलिए अर्जुन का मना करना उसे सिर्फ निजी इनकार नहीं लगा, बल्कि स्वाभिमान को लगी चोट लगी। किसी का हमसे प्यार करे, यह चाहना स्वाभाविक है, पर सामने वाले पर उस प्रेम को कबूल करना लाज़िम नहीं होता। उर्वशी की भावनाओं को समझते हुए उसके गुस्से को भी उस दौर की कथा के संदर्भ में देखना पड़ता है। उसके मन की चोट आगे चलकर क्रोध में बदल गई।
अर्जुन के नकार से भड़की उर्वशी ने उसे शाप दे दिया। उसने कहा कि इस शाप से अर्जुन को एक अवधि के लिए नपुंसकत्व की अवस्था मिलेगी। अर्जुन के लिए यह शाप बेहद दुखद था। लेकिन इस प्रसंग में एक बार फिर नियति का अनोखा खेल दिखता है। अर्जुन ने यह बात इंद्र को बताई। इंद्र ने उसे हौसला दिया और कहा कि यह शाप आगे उसके काम आएगा। आगे वैसा ही हुआ।
वनवास के बाद पांडवों को एक साल अज्ञातवास में रहना था, और शर्त थी कि इस दौरान कोई उन्हें पहचान न पाए। अर्जुन ने इस अज्ञातवास में बृहन्नला का रूप लिया। वह विराट राजा के दरबार में स्त्री जैसे रूप में रहा और राजकन्या उत्तरा को नृत्य व संगीत सिखाया। अर्जुन को नृत्य-संगीत का ज्ञान था, और उर्वशी के शाप से मिली अवस्था उसके अज्ञातवास के लिए काम की साबित हुई। जो बात शुरू में मुसीबत लगती थी, वही उसकी सुरक्षा का जरिया बन गई।
पूरी कथा का सबसे हैरान करने वाला हिस्सा शाप का वरदान में बदल जाना है। उर्वशी ने गुस्से में जो शाप दिया, वह अर्जुन के आगे के अज्ञातवास में काम आया। बृहन्नला बनकर वह अपनी असली पहचान छिपा पाया और पांडवों का अज्ञातवास पूरा हुआ।
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