जीत के बाद भी लंका में नहीं रुके राम, विभीषण को राजा बनाकर अयोध्या लौटे
रावण का वध करने के बाद प्रभु श्रीराम ने लंका पर अपना हक नहीं जताया और विभीषण का अभिषेक कर अयोध्या की राह पकड़ी।
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रावण का वध करके अधर्म पर धर्म की जीत हासिल करने के बाद प्रभु श्रीराम लंका में ज्यादा देर नहीं रुके और अयोध्या के लिए रवाना हो गए। लंका जैसी सोने की नगरी जीतने का मौका उनके पास था, फिर भी उन्होंने वहां के राज पर अपना अधिकार नहीं जताया। उन्होंने रावण के भाई विभीषण को लंका का राजा बनाकर उनका अभिषेक किया और अपनी मातृभूमि की तरफ लौटने का फैसला लिया। बताया गया है कि रामजी के इस कदम के पीछे सिर्फ अयोध्या लौटने की चाह नहीं थी। इसमें वचन निभाने, कर्तव्य के प्रति निष्ठा और मातृभूमि के प्रति प्रेम जैसे ऊंचे मूल्य भी झलकते थे।
इसकी एक वजह भरत की प्रतिज्ञा से जुड़ी है। जब रामजी को चौदह साल का वनवास भोगना पड़ा, तब भरत ने अयोध्या का राज लेने से इनकार कर दिया था। उन्होंने रामजी की पादुकाएं सिंहासन पर रखीं और उनके प्रतिनिधि के तौर पर राजकाज संभाला। भरत को उम्मीद थी कि वनवास के चौदह साल पूरे होते ही प्रभु राम अयोध्या लौट आएंगे। रामजी की गैरमौजूदगी में भरत ने बड़े संयम और त्याग की भावना से जीवन बिताया।
रामायण में इसका जिक्र है कि अगर राम वनवास से समय पर नहीं लौटे, तो भरत ने प्राण त्यागने की प्रतिज्ञा की थी। इसलिए रामजी के लिए अयोध्या लौटना सिर्फ परिवार की खुशी का मामला नहीं था। यह अपने प्यारे भाई को दिए गए शब्द और उसके जीवन से जुड़ा सवाल था।
वचन निभाना ही रामजी के पूरे जीवन का आदर्श रहा है। पिता राजा दशरथ ने कैकेयी को जो वचन दिया था, उसे पूरा करने के लिए रामजी ने बिना किसी शिकायत के राजसी वैभव छोड़ा और वनवास स्वीकार कर लिया। उनके लिए निजी सुख से बढ़कर कर्तव्य और सत्य था। चौदह साल का वनवास पूरा होने के बाद अयोध्या लौटना भी उनके कर्तव्य का हिस्सा था। इसीलिए लंका में जीत के बाद वहां ज्यादा रुकने के बजाय उन्होंने तय समय में अयोध्या पहुंचने को तरजीह दी। इससे यह संदेश मिलता है कि जीवन में संकट कितने भी बड़े हों, दिए हुए शब्द की अहमियत कम नहीं होनी चाहिए।
रामायण में लंका को दौलत, वैभव और सोने के महलों से भरी नगरी बताया गया है। रावण को हराने के बाद उस राज्य पर अपना दबदबा कायम करने का मौका रामजी के पास था। मगर उनका मकसद लंका पर राज करना था ही नहीं। सीता को छुड़ाना, अन्याय का मुकाबला करना और धर्म की प्रतिष्ठा बनाए रखना उनकी मुहिम के मुख्य उद्देश्य थे।
इसी वजह से उन्होंने लंका का राज विभीषण को सौंपा। विभीषण ने रावण के अधर्म का विरोध करके रामजी का साथ दिया था। उन्हें राजा बनाकर रामजी ने न्यायपूर्ण और धर्म पर टिकी राज व्यवस्था की मिसाल रखी। उन्होंने अपने कर्म से दिखाया कि जीत का मतलब दूसरे का राज हड़पना नहीं है, बल्कि अन्याय का अंत करके सही व्यक्ति के हाथ में सत्ता सौंपना है।
रामायण का एक मशहूर सुभाषित है, 'जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी'। इसका मतलब है कि माता और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं। उत्तरकांड से जुड़ी प्रचलित रामायण परंपरा में बताया गया है कि लंका का वैभव देखकर लक्ष्मण ने वहीं रहने की इच्छा जताई थी। उसी प्रसंग में राम ये विचार रखते हैं। इस वचन का आशय मातृभूमि के प्रति प्रेम और अपनी जड़ों से जुड़ी निष्ठा है।
सुवर्णलंका का वैभव कितना भी लुभावना हो, प्रभु राम के लिए अयोध्या सिर्फ एक राजधानी नहीं थी। वह उनकी जन्मभूमि, परिवार, प्रजा और कर्तव्य का प्रतीक थी। इसलिए पराई धरती की दौलत से ज्यादा कीमती उनके लिए अपनी मातृभूमि से रिश्ता था।
विभीषण का राज्याभिषेक होने के बाद प्रभु राम ने माता सीता, लक्ष्मण और अपने साथियों के साथ अयोध्या की वापसी का सफर शुरू किया। रामायण की कथा के मुताबिक इस सफर के लिए पुष्पक विमान का इस्तेमाल हुआ। रास्ते में उन्होंने सीता को युद्ध और वनवास से जुड़ी अहम जगहों की जानकारी दी, ऐसा वर्णन आता है।
अयोध्या में रामजी के आने से चौदह साल का इंतजार खत्म हुआ। भरत की निष्ठा, रामजी का वचन निभाना और प्रजा का प्रेम, इन सबका यह भावपूर्ण संगम था। इस प्रसंग से यह एहसास होता है कि रामराज्य की बुनियाद सिर्फ ताकत या जीत में नहीं, बल्कि त्याग, न्याय, कर्तव्य और लोककल्याण में है।
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