एमबीबीएस डॉक्टर क्या-क्या कर सकते हैं: काम, नौकरी और तनख्वाह का पूरा हिसाब
एमबीबीएस की डिग्री के बाद डॉक्टर का काम क्या होता है, वे कहां नौकरी कर सकते हैं, क्लिनिक खोलने के क्या नियम हैं और तनख्वाह कितनी मिलती है।
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
बीमार पड़ने या अस्पताल का नाम आते ही सफेद कोट पहने एमबीबीएस डॉक्टर की तस्वीर सामने आ जाती है। भारत में डॉक्टरी की पढ़ाई और इलाज की दुनिया में एमबीबीएस को सबसे पहली और मजबूत सीढ़ी माना जाता है। लोगों के मन में इस डिग्री, डॉक्टरों के काम और उनकी कमाई को लेकर कई सवाल रहते हैं। जैसे, क्या एमबीबीएस डॉक्टर ऑपरेशन कर सकता है या सिर्फ प्राथमिक इलाज करता है?
एमबीबीएस यानी 'बैचलर ऑफ मेडिसिन एंड बैचलर ऑफ सर्जरी'। यह डिग्री लेने के बाद आदमी 'फिजिशियन' बनता है। यह सफर साढ़े पांच साल का होता है, जिसमें 4.5 साल की पढ़ाई और 1 साल की जरूरी इंटर्नशिप शामिल है। इसके बाद डॉक्टर को मरीजों का इलाज करने का कानूनी अधिकार मिल जाता है। सरकारी अस्पताल से लेकर अपने खुद के क्लिनिक तक, करियर के कई रास्ते खुलते हैं।
एमबीबीएस डॉक्टर मुख्य रूप से जनरल फिजिशियन या प्राथमिक देखभाल करने वाले फिजिशियन होते हैं। उनका काम मरीज की बीमारी का शुरुआती निदान करना और इलाज शुरू करना होता है। बुखार, सर्दी, खांसी से लेकर ब्लड प्रेशर और डायबिटीज जैसी आम बीमारियों की जांच और डायग्नोसिस वे करते हैं। बीमारी के हिसाब से दवाएं लिखते हैं और जरूरत पड़ने पर मरीज को पैथोलॉजी टेस्ट या स्कैन कराने की सलाह देते हैं।
अगर बीमारी गंभीर हो, तो मरीज को कार्डियोलॉजिस्ट, न्यूरोलॉजिस्ट या ऑर्थोपेडिक सर्जन जैसे स्पेशलिस्ट के पास भेजा जाता है। इमरजेंसी में और छोटी सर्जरी के मामलों में छोटी-बड़ी चोटों पर टांके लगाना, ड्रेसिंग करना और आपात स्थिति में मरीज की जान बचाना भी उनके काम में गिना गया है।
नौकरी की बात करें तो एमबीबीएस की डिग्री पूरे देश में मान्य है। केंद्र या राज्य सरकार के बड़े अस्पतालों से लेकर गांव-गांव के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक, CHC/PHC में मेडिकल ऑफिसर (MO) का पद होता है। फोर्टिस, मैक्स या अपोलो जैसे बड़े मल्टी-स्पेशलिटी प्राइवेट अस्पतालों में जूनियर रेजिडेंट (JR) या इमरजेंसी डॉक्टर के तौर पर काम मिलता है। इंडियन आर्मी, नेवी, एयर फोर्स या बीएसएफ में कैप्टन या मेडिकल ऑफिसर का पद भी एक रास्ता है। इसके अलावा बड़ी कंपनियों के मेडिकल हेल्थ सेंटर, फार्मास्युटिकल कंपनियां और रिसर्च लैब में भी मौके हैं।
अपना काम शुरू करने के लिए नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) में रजिस्ट्रेशन के बाद एमबीबीएस डॉक्टर अपना क्लिनिक या प्राइमरी हेल्थ केयर सेंटर खोल सकते हैं। क्लिनिक खोलने के लिए स्टेट मेडिकल काउंसिल में रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी है। बायोमेडिकल वेस्ट डिस्पोजल और स्थानीय प्राधिकरण, यानी महानगरपालिका या नगरपालिका, के जरूरी परमिट भी लेने पड़ते हैं। वे टेली-कंसल्टेशन भी दे सकते हैं।
तनख्वाह अनुभव, काम की जगह (शहर या गांव) और जॉब प्रोफाइल पर निर्भर करती है। सरकारी क्षेत्र में शुरुआती तनख्वाह महीने के 65,000 से 90,000 रुपये के बीच रहती है, जिसमें NPA यानी नॉन-प्रैक्टिसिंग अलाउंस भी शामिल है। प्राइवेट क्षेत्र में शुरुआती तनख्वाह महीने के करीब 50,000 से 75,000 रुपये होती है। अपने क्लिनिक में अगर जगह सही हो और मरीज ज्यादा आएं, तो कमाई की कोई ऊपरी सीमा नहीं रहती। शुरुआत में महीने के 1 लाख से 3 लाख रुपये या उससे ज्यादा आराम से कमाए जा सकते हैं।
ज्यादातर मेडिकल ग्रेजुएट एमबीबीएस के बाद आगे की स्पेशलाइजेशन के लिए पढ़ाई करते हैं। MD (डॉक्टर ऑफ मेडिसिन) नॉन-सर्जिकल स्पेशलाइजेशन के लिए है, जैसे बच्चों के डॉक्टर, त्वचा रोग विशेषज्ञ और जनरल मेडिसिन। MS (मास्टर ऑफ सर्जरी) सर्जिकल स्पेशलाइजेशन के लिए है, जैसे जनरल सर्जन और ईएनटी सर्जन। इसके अलावा DNB या डिप्लोमा से दूसरे क्लिनिकल क्षेत्रों में खास महारत हासिल की जा सकती है।