अमेरिका में 61 साल के गौतम देव को नहीं मिल रही नौकरी, IIT कानपुर से पढ़े हैं, 20 साल का अनुभव
IIT कानपुर से पढ़े 61 साल के गौतम देव को 20 साल से ज्यादा के अनुभव के बावजूद अमेरिका में स्थायी नौकरी नहीं मिल रही।
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किसी नामी संस्थान की डिग्री और दो दशक से ज्यादा का अनुभव आम तौर पर मजबूत करियर की पहचान माना जाता है। लेकिन अमेरिका में रहने वाले गौतम देव की कहानी बताती है कि बदलते जॉब मार्केट में डिग्री और अनुभव होने के बावजूद हालात कितनी तेजी से पलट सकते हैं। गौतम 61 साल के हैं, उन्होंने IIT कानपुर (IIT Kanpur) से पढ़ाई की है और टेक्नोलॉजी सेक्टर में उन्हें 20 साल से ज्यादा का अनुभव है। आज वे स्थायी नौकरी की तलाश में हैं।
उनकी मुश्किलें सितंबर 2024 में शुरू हुईं। उस वक्त वे डैलस (Dallas) में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के तौर पर काम कर रहे थे। कंपनी ने उनसे कहा कि नौकरी जारी रखनी है तो दूसरे राज्य में शिफ्ट होना पड़ेगा। गौतम ने जगह बदलने के बजाय डैलस में ही रहकर नई नौकरी ढूंढने का फैसला किया। उन्हें उम्मीद थी कि पुराने अनुभव और टेक्निकल बैकग्राउंड के दम पर कुछ महीनों में नया मौका मिल जाएगा। पर यह उम्मीद धीरे-धीरे लंबी बेरोजगारी में बदल गई।
गौतम ने अपने प्रोफेशनल नेटवर्क के जरिए नौकरियां तलाशनी शुरू कीं। कई जगह संपर्क करने पर भी बात नहीं बनी। कुछ जगहों पर भर्ती चल ही नहीं रही थी, और कई कर्मचारी खुद अपनी नौकरी को लेकर असुरक्षित महसूस कर रहे थे। इंटरव्यू के मौके जरूर मिले, और एक कंपनी में तो कई राउंड तक बातचीत भी हुई, लेकिन आखिर में जॉब ऑफर नहीं मिला।
गौतम के मुताबिक उनकी उम्र और लंबे समय से नौकरी से बाहर रहना अब उनके लिए बड़ी चुनौती बन गया है। टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री भी तेजी से बदल रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़े पदों की मांग बढ़ती देखकर उन्हें लगा कि उनका अनुभव हर नई भूमिका के लिए काफी नहीं है। एआई इंजीनियरिंग की कई जगहें देखने के बाद भी वे खुद को उन पदों के लिए पूरी तरह फिट नहीं मानते।
लगातार अर्जी देने के बाद भी स्थायी नौकरी नहीं मिली तो गौतम ने अपना खर्च चलाने के लिए दूसरे रास्ते खोजे। कुछ वक्त उन्होंने डे ट्रेडिंग से कमाई की कोशिश की। शुरुआत में फायदा हुआ, पर यह कमाई ज्यादा दिन नहीं टिकी। इसके बाद उन्होंने उबर, डोरडैश और वॉलमार्ट स्पार्क जैसे प्लेटफॉर्म पर गिग वर्क शुरू किया। मगर डिलीवरी से होने वाली आमदनी उनके खर्च के मुकाबले कम पड़ती है। ऊपर से सेहत की वजह से वे हर तरह का डिलीवरी असाइनमेंट नहीं कर पाते।
लंबे वक्त तक बेरोजगार रहने का असर अब उनकी आर्थिक हालत पर साफ दिख रहा है। उनकी बचत खत्म हो चुकी है और रोजमर्रा के खर्च चलाने के लिए क्रेडिट कार्ड का कर्ज बढ़ गया है। डैलस का किराया भी उनके लिए बड़ी चिंता बन गया है। वे सस्ता घर ढूंढना चाहते हैं, लेकिन उन्हें डर है कि नियमित नौकरी और आमदनी के बिना नया घर मिलना मुश्किल हो सकता है।