मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

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19:12 IST

ध्वनी प्रदूषण पर मुंबई हाईकोर्ट सख्त, लाउडस्पीकर के लिए अनुमति अनिवार्य

गणेशोत्सव में डीजे और ढोल-ताशा के शोर पर मुंबई हाईकोर्ट ने खुद संज्ञान लेते हुए याचिका दाखल की, सरकार से जवाब तलब

ध्वनी प्रदूषण पर मुंबई हाईकोर्ट सख्त, लाउडस्पीकर के लिए अनुमति अनिवार्य
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

मुंबई हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ कर दिया है कि किसी भी धार्मिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक या सामाजिक कार्यक्रम में लाउडस्पीकर लगाने से पहले संबंधित अधिकारियों से परमिशन लेना जरूरी होगा। कोर्ट ने कहा कि लोगों के शांति से रहने के अधिकार की रक्षा के लिए और आवाज के प्रदूषण पर काबू पाने के लिए नियमों का सख्ती से पालन करना होगा।

गणेशोत्सव के दौरान डीजे, लाउडस्पीकर और ढोल-ताशा बजाए जाने से होने वाले ध्वनि प्रदूषण को लेकर मुंबई हाईकोर्ट ने खुद इस मामले का गंभीरता से संज्ञान लिया। कोर्ट ने सवाल उठाया कि इन साउंड सिस्टम को आखिर किस आधार पर परमिशन दी जाती है। इसी को लेकर कोर्ट ने खुद एक सुमोटो याचिका दाखल की।

जस्टिस गिरीश कुलकर्णी और जस्टिस नीला गोखले की बेंच ने एडवोकेट जनरल मिलिंद साठे को बुलाकर सरकार से जवाब मांगा। बेंच ने कहा कि उन्हें किसी धार्मिक त्योहार से कोई ऐतराज नहीं है, लेकिन त्योहार के नाम पर जो बाजार और उछल-कूद चल रही है, उस पर उन्हें एतराज है। कोर्ट ने सरकार को इस मामले में अपना रुख साफ करने का सीधा निर्देश दिया। इस याचिका की सुनवाई मंगलवार दोपहर के लिए तय की गई है।

दरअसल पुणे में धार्मिक मंडलों और शहरी तबके के बीच इस मुद्दे पर टकराव को उजागर करने वाली एक जनहित याचिका कोर्ट में दाखल थी। सोमवार को कामकाज शुरू होने से पहले जस्टिस गिरीश कुलकर्णी और जस्टिस नीला गोखले ने एडवोकेट जनरल मिलिंद साठे और रजिस्ट्रार को तलब किया। एडवोकेट साठे के पहुंचते ही बेंच ने सवालों की झड़ी लगा दी और जुलूसों में होने वाले शोर पर चिंता जताई।

कोर्ट के आदेश के मुताबिक अस्पताल, स्कूल-कॉलेज और कोर्ट परिसर से 100 मीटर के दायरे में, जिसे साइलेंस जोन माना जाता है, लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर सख्त पाबंदी रहेगी। इसके अलावा बाकी सार्वजनिक जगहों पर भी तय डेसिबल लिमिट का पालन करना अनिवार्य होगा।

कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों को शांति से जीने और ध्वनि प्रदूषण से मुक्त रहने का अधिकार है। इसी अधिकार को ध्यान में रखते हुए मुंबई हाईकोर्ट ने यह फैसला सुनाया है।

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