चंद्रपुर में सूखे से चारे की किल्लत का डर, पशुपालक अभी से करें इंतज़ाम
कृषि विज्ञान केंद्र, सिंदेवाही की डॉ. सोनाली दुपटे ने पशुपालकों से चारा प्रबंधन की तैयारी अभी से शुरू करने को कहा है।
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चंद्रपुर जिले में सूखे के हालात हैं और आगे चलकर चारे की किल्लत हो सकती है। इसी को देखते हुए कृषि विज्ञान केंद्र, सिंदेवाही की वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सोनाली दुपटे ने पशुपालकों से अपील की है कि वे चारे के इंतज़ाम की योजना अभी से बना लें।
उनका कहना है कि जो चारा मौजूद है उसे सोच-समझकर और किफायत से इस्तेमाल किया जाए। इसके अलावा साइलेज बनाना, अज़ोला उगाना और खेती की फसलों के बचे हुए अवशेषों पर प्रक्रिया करके उन्हें काम में लाना, इन तरीकों से पशुधन को बचाया जा सकता है।
सूखे के दिनों में हरा और सूखा चारा जुटाना पशुपालकों के लिए बड़ी चुनौती होती है। ऐसे में चारा बर्बाद होने से बचाना और जानवरों को सही मात्रा में खिलाना ज़रूरी है। चारे की कुट्टी करके जानवरों को देने से करीब 20 से 25 प्रतिशत तक बचत हो सकती है। साथ ही घटिया क्वालिटी के सूखे चारे पर वैज्ञानिक तरीके से प्रक्रिया की जाए तो उसे पचाना आसान होता है और उसकी पौष्टिकता भी बढ़ती है।
धान का पुआल, सोयाबीन का कुटार, मक्के के अवशेष, गेहूं का डंठल और अरहर का भूसा, इन सबको ठीक तरह से इस्तेमाल करके जानवरों के लिए चारा तैयार किया जा सकता है। फसलों के अवशेष जलाने के बजाय उनका वैज्ञानिक ढंग से उपयोग करने पर ज़ोर देना चाहिए। यूरिया प्रक्रिया वाला चारा बनाते समय पशु चिकित्सा अधिकारी या पशु पोषण विशेषज्ञ की सलाह लेना ज़रूरी है।
फफूंद लगा या गंदा चारा जानवरों को नहीं देना चाहिए। हरे चारे का स्टॉक रखने के लिए साइलेज बनाना कारगर तरीका है। हरी मक्का या ज्वार को सही अवस्था में काटकर उसकी बारीक कुट्टी करें और उसे गड्ढे, सीमेंट की टंकी या खास साइलेज बैग में हवाबंद करके रखें। सही प्रक्रिया से बना साइलेज करीब 45 से 50 दिन में इस्तेमाल के लिए तैयार हो सकता है। सूखे के समय यह जानवरों को रसदार चारा देने के साथ दूध उत्पादन बनाए रखने में भी काम आता है।
चारा फसलों की बुआई की योजना भी पहले से बनानी चाहिए। पानी कितना उपलब्ध है, यह देखकर अक्टूबर-नवंबर में ल्यूसर्न, बरसीम और ओट जैसी चारा फसलें लगाने का प्लान करें। जिन इलाकों में पानी की कमी है, वहां मौजूद पानी का हिसाब लगाकर ही फसल चुनें। गांव के स्तर पर मिलकर चारा जमा करने और साइलेज बनाने की योजना बने तो किल्लत की मार कम की जा सकती है।
अज़ोला पानी पर उगने वाला प्रोटीन से भरपूर पौधा है और जानवरों के पूरक आहार के तौर पर काम आता है। छायादार जगह पर ठीक इंतज़ाम करके उगाया जाए तो करीब 15 से 18 दिन में इसकी कटाई शुरू हो सकती है। गाय, भैंस और बकरियों के खाने में इसे पूरक चारे के रूप में शामिल किया जा सकता है।