बॉम्बे हाईकोर्ट: शांतिपूर्ण आंदोलन हर नागरिक का हक, गैरकानूनी गिरफ्तारी बर्दाश्त नहीं
मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग वाले आंदोलन में लोगों को हिरासत में लेने के मामले में हाईकोर्ट ने सरकार और पुलिस अफसरों से हलफनामा मांगा है। अगली सुनवाई 19 नवंबर को है।
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मुंबई में मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर हुए आंदोलन के दौरान आंदोलनकारियों को हिरासत में लेने के मामले में मुंबई हाईकोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने साफ किया कि शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन करना हर नागरिक का अधिकार है। साथ ही कोर्ट ने चेतावनी दी कि किसी की भी गैरकानूनी गिरफ्तारी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
कोर्ट ने इस मामले में राज्य सरकार और संबंधित पुलिस अफसरों से हलफनामा मांगा है। लेकिन आंदोलनकारियों को गिरफ्तार करने पर पूरी तरह रोक लगाने वाला आदेश देने से कोर्ट ने मना कर दिया। मामले की अगली सुनवाई 19 नवंबर को होगी।
यह मामला एक जनहित याचिका से जुड़ा है, जो आंदोलन के दौरान पुलिस की कार्रवाई के खिलाफ मुंबई हाईकोर्ट में दाखिल की गई है। याचिका में आंदोलनकारियों को हिरासत में लेने के तरीके पर सवाल उठाए गए हैं।
याचिका के मुताबिक 10 अक्टूबर को अगस्त क्रांति मैदान से करीब 600 लोगों को हिरासत में लिया गया। अगले दिन, 11 अक्टूबर को शिवाजी पार्क इलाके से करीब 300 लोगों को हिरासत में लिया गया। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि इस कार्रवाई में आंदोलनकारियों के साथ महिलाओं, छोटे बच्चों, बुजुर्गों और राह चलते लोगों को भी हिरासत में लिया गया।
इन घटनाओं के बाद पुलिस की कार्रवाई के कानूनी होने और नागरिकों के आंदोलन के अधिकार को लेकर सवाल खड़े हुए हैं। याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि कोर्ट दखल देकर सही निर्देश दे।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने शांतिपूर्ण आंदोलन के अधिकार की अहमियत पर जोर दिया। कोर्ट के मुताबिक नागरिकों को अपनी बात रखने और विरोध जताने के लिए शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन करने का अधिकार है। साथ ही इस अधिकार के संदर्भ में पुलिस की कार्रवाई कितनी कानूनी थी, यह जांचना भी जरूरी है।
इसी वजह से कोर्ट ने राज्य सरकार और पुलिस अफसरों को हलफनामा देने के निर्देश दिए। आंदोलन के दौरान असल में क्या हालात बने, पुलिस ने किन वजहों से लोगों को हिरासत में लिया और यह कार्रवाई किन कानूनी प्रावधानों के तहत की गई, इन बातों पर सरकार का रुख अहम होगा।
आंदोलनकारियों को हिरासत में लेने या गिरफ्तार करने पर पूरी तरह रोक लगाने वाला आदेश देने से कोर्ट ने इनकार कर दिया। यानी कोर्ट ने आगे की कानूनी प्रक्रिया को अहमियत दी है। नागरिकों को आंदोलन का अधिकार है, फिर भी हर हालत में पुलिस की कार्रवाई पर पूरी तरह पाबंदी लगाई जा सके, ऐसा जरूरी नहीं। इसलिए अगली सुनवाई में उस वक्त के हालात, पुलिस की कार्रवाई की वजहें और लागू कानूनी प्रावधान अहम हो सकते हैं।
कोर्ट ने सरकार और पुलिस से हलफनामा मांगा है, इसलिए अब इस कार्रवाई पर आधिकारिक पक्ष सामने आने की उम्मीद है। यहां याचिकाकर्ताओं के लगाए आरोपों और कोर्ट की दर्ज की गई टिप्पणियों के फर्क को ध्यान में रखना जरूरी है।
अब सबकी नजर 19 नवंबर की सुनवाई पर है, जब राज्य सरकार और संबंधित पुलिस अफसर हलफनामे में अपनी जानकारी देंगे। उस दिन आंदोलन के दौरान हुई धरपकड़ के कानूनी पहलू और नागरिकों के अधिकारों की हिफाजत, दोनों मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है।