बालिका दिन पर देखिए: भारत में लड़कियों की पढ़ाई कितनी बदली और कौन से पड़ाव अब भी बाकी हैं
अंतरराष्ट्रीय बालिका दिन पर एक नज़र कि स्कूल से लेकर STEM तक लड़कियों की पढ़ाई में क्या बदला, और गांव-देहात में कौन सी चुनौतियां अब भी कायम हैं।
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
हर साल 11 अक्टूबर को दुनिया भर में अंतरराष्ट्रीय बालिका दिन मनाया जाता है। इस दिन का मकसद लड़कियों के अधिकार, उनकी सेहत, सुरक्षा और पढ़ाई को लेकर समाज में जागरूकता फैलाना है। भारत जैसे बड़े देश में एक वक्त ऐसा था जब लड़कियों को घर की दहलीज़ के बाहर कदम रखने की भी इजाज़त नहीं थी। आज वही लड़कियां पढ़ाई के दम पर अंतरिक्ष अनुसंधान से लेकर कॉरपोरेट जगत तक अपनी पहचान बना रही हैं।
पिछले दो-तीन दशकों को देखें तो लड़कियों की प्राइमरी और सेकेंडरी पढ़ाई में सचमुच क्रांति आई है। सर्व शिक्षा अभियान, बच्चों के मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार कानून (RTE) और बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसी मुहिमों की वजह से आज देश के कोने-कोने की लड़की स्कूल की सीढ़ियां चढ़ रही है। प्राइमरी स्कूलों के ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो (GER) में ज़बरदस्त सुधार हुआ है। अब प्राइमरी कक्षाओं में लड़कियों की गिनती लड़कों के बराबर है और कुछ जगहों पर उनसे ज़्यादा भी दिखती है। सावित्रीबाई फुले की सोच की विरासत संभालने वाला महाराष्ट्र हो या दूसरे राज्य, लड़कियों की पढ़ाई को लेकर मां-बाप का नज़रिया बदला है।
बात सिर्फ स्कूल में नाम लिखवाने तक सीमित नहीं है। लड़कियों को नियमित स्कूल तक लाने में कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय, साइकिल बांटने की योजना, मुफ्त किताबें और यूनिफॉर्म, और मिड-डे मील जैसी पहलों ने बड़ी भूमिका निभाई है। कई राज्यों में लड़कियों के नाम पर बचत योजनाएं शुरू हुई हैं, जैसे सुकन्या समृद्धि योजना, जिनसे उनकी ऊंची पढ़ाई की राह आसान हुई है। आज मेडिकल, इंजीनियरिंग, कानून और सिविल सर्विस की परीक्षाओं में लड़कियां पहले नंबर पर आ रही हैं।
ऊंची पढ़ाई में, खासकर STEM यानी विज्ञान के आधुनिक क्षेत्रों में, लड़कियों की हिस्सेदारी पहले से काफी बढ़ी है। इसरो (ISRO) की रॉकेट साइंटिस्ट हों या आईटी सेक्टर की सॉफ्टवेयर इंजीनियर, भारतीय लड़कियों ने अपनी काबिलियत से दुनिया भर में देश का नाम रोशन किया है।
लेकिन इस अच्छी तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। प्राइमरी पूरी होने के बाद जब लड़कियां क्लास 9 से 12 तक पहुंचती हैं, तब उनके स्कूल छोड़ने की दर यानी ड्रॉपआउट रेट अब भी चिंता की बात है। कई ग्रामीण इलाकों में लड़कियां बड़ी होने पर माहवारी के दिनों में अलग शौचालय न होने या साफ-सफाई की कमी की वजह से स्कूल छोड़ देती हैं। इसके अलावा गांव से हाई स्कूल की दूरी ज़्यादा होना और सुरक्षा का सवाल भी है, जिसके चलते कई मां-बाप लड़कियों को दूर के स्कूल भेजने से डरते हैं।
दूसरी बड़ी चुनौती बाल विवाह और घर के कामों का बोझ है। कोरोना महामारी के बाद और पैसों की तंगी की वजह से कई परिवारों में आज भी लड़कों की पढ़ाई को पहले रखा जाता है और लड़कियों की शादी की जल्दी की जाती है। डिजिटल दौर में डिजिटल जेंडर गैप की नई समस्या भी सामने आई है। घर में एक ही स्मार्टफोन या कंप्यूटर हो तो उसे पहले लड़का इस्तेमाल करता है और लड़की इस तकनीक से दूर रह जाती है।
लड़कियों की पढ़ाई में असली बदलाव तभी पूरा होगा जब उन्हें सिर्फ डिग्री न मिले, बल्कि वे कमाकर अपने पैरों पर खड़ी हों। इसके लिए स्कूलों में वोकेशनल ट्रेनिंग, डिजिटल साक्षरता और लाइफ स्किल्स की पढ़ाई देना वक्त की ज़रूरत बन गया है। साथ ही स्कूलों में सुरक्षित माहौल, सैनिटरी पैड की मुफ्त उपलब्धता और सुरक्षित आने-जाने की व्यवस्था पर ज़ोर दिया जाना चाहिए।
एक लड़की की पढ़ाई का मतलब है पूरे परिवार का और इस तरह देश का सशक्त होना। बालिका दिन के मौके पर यह याद रखना चाहिए कि हर लड़की को सुरक्षित, इज़्ज़तदार और अच्छी क्वालिटी की पढ़ाई मिलना उसका बुनियादी अधिकार है। समाज में भेदभाव की दीवार पूरी तरह गिरे और हर लड़की अपना सपना पूरा कर सके, तभी सही मायने में विकसित भारत का सपना साकार होगा।