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04:21 IST

विश्व डाक दिवस: स्मार्टफोन के दौर में भी पुणे की पुरानी जीपीओ इमारत की शान कायम

पुणे के बीचोबीच खड़ी ऐतिहासिक जीपीओ इमारत 'दाक' के जमाने से डिजिटल सेवाओं तक डाक व्यवस्था के बदलाव की गवाह है।

विश्व डाक दिवस: स्मार्टफोन के दौर में भी पुणे की पुरानी जीपीओ इमारत की शान कायम तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

मोबाइल पर एक क्लिक करते ही संदेश कुछ सेकंड में दुनिया के किसी भी कोने तक पहुंच जाता है। व्हाट्सऐप, ई-मेल और सोशल मीडिया के दौर में कागज पर लिखी चिट्ठी की जगह लगभग इतिहास बन चुकी है। फिर भी पुणे के मध्य भाग में खड़ी ऐतिहासिक जीपीओ की इमारत आज भी इस बदलाव की गवाही देती हुई मौजूद है। 'दाक' के जमाने से लेकर डिजिटल सेवाओं तक डाक व्यवस्था का पूरा सफर इस इमारत ने करीब से देखा है। विश्व डाक दिवस के मौके पर यह इमारत खास तौर पर याद आती है।

पुणे में डाक सेवा का इतिहास ब्रिटिश काल से भी पहले तक जाता है। पेशवाओं के समय 'दाक' के जरिए अहम जगहों तक संदेश पहुंचाए जाते थे। साल 1818 के बाद अंग्रेजों ने पुणे की डाक व्यवस्था को और ज्यादा संगठित किया। आगे चलकर 1854 के पोस्ट ऑफिस कानून के बाद पूरे देश की डाक व्यवस्था में बड़े बदलाव हुए। 19वीं सदी में पुणे में संगठित डाक व्यवस्था का विस्तार हुआ।

पुणे जीपीओ के परिसर में उस पुराने दौर की कई निशानियां आज भी दिखती हैं। पहले डाक ढोने के लिए हाथियों का इस्तेमाल होता था। उन हाथियों की जंजीरें या रस्सियां बांधने के लिए जो पत्थर लगाए जाते थे, वे आज भी परिसर में इतिहास की गवाही देते हैं। इसके अलावा जीपीओ परिसर में लगे पुराने letterbox पर रानी एलिजाबेथ के मुकुट का निशान बना है। उस letterbox से भेजी गई चिट्ठियों पर पुणे मुख्य डाक कार्यालय की खास चित्रों वाली मुहर लगती थी।

वक्त बदला तो डाक व्यवस्था ने भी खुद को उसी हिसाब से बदला। स्पीड पोस्ट, पार्सल, बचत योजनाएं, डाक जीवन बीमा और आधार से जुड़ी सेवाओं समेत कई सुविधाएं अब डाक कार्यालय से मिलने लगी हैं। इसलिए आज डाक कार्यालय सिर्फ चिट्ठी भेजने की जगह नहीं रह गया है। पुणे जीपीओ और शहर के दूसरे डाक कार्यालयों में लोग कई तरह की आर्थिक और नागरिक सेवाएं लेने आते हैं।

एक समय था जब कोई चिट्ठी अपने आदमी तक पहुंचने में दिन या हफ्ते लग जाते थे। अब डिजिटल संदेश कुछ सेकंड में पहुंच जाता है। इसके बावजूद कागज पर लिखी चिट्ठी की भावनात्मक कीमत बनी हुई है। इसीलिए पुणे की इस ऐतिहासिक जीपीओ को देखकर लगता है कि यह सिर्फ एक सरकारी दफ्तर का परिसर नहीं है, बल्कि शहर की बदलती संवाद व्यवस्था का जीता-जागता इतिहास है।

इमारत के इतिहास की कुछ अहम बातें इस तरह हैं। 1928 में पुणे जीपीओ की मौजूदा इमारत का विस्तार हुआ। हाथियों से डाक ढोए जाने की गवाही देने वाले पत्थर आज भी परिसर में हैं। रानी एलिजाबेथ के मुकुट के निशान वाला पुराना letterbox भी वहीं है। आज का जीपीओ चिट्ठियों के साथ पार्सल, बचत, बीमा, आधार जैसी कई सेवाओं का केंद्र है।

विश्व डाक दिवस पर पुणे की जीपीओ को देखें तो 'चिट्ठी से डिजिटल संदेश तक' का पूरा सफर एक ही इमारत में महसूस किया जा सकता है।

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