पुणे के MPSC आंदोलन पर सदावर्ते बोले, छात्रों पर मालिकाना हक न जताएं पार्टियां
वकील गुणरत्न सदावर्ते ने पुणे में MPSC छात्रों के आंदोलन पर प्रतिक्रिया दी और कहा कि परीक्षा पर भरोसा कायम रहना चाहिए।
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पुणे में MPSC के छात्रों का आंदोलन पिछले 12 दिनों से चल रहा है। इसके चलते राज्य का सियासी माहौल गरमा गया है। अलग-अलग पार्टियों के नेता आंदोलन की जगह पर आकर छात्रों को अपना समर्थन जता चुके हैं। अब इस मामले में वकील गुणरत्न सदावर्ते ने भी अपनी बात रखी है।
एस एम जोशी मार्ग पर विधायक रोहित पवार की अगुवाई में छात्र धरने पर बैठे हैं। आंदोलन कर रहे छात्र MPSC के अध्यक्ष विवेक भीमनवार के इस्तीफे की मांग पर अड़े हुए हैं। इसी बारे में सदावर्ते ने मीडिया से बात की।
सदावर्ते ने कहा कि परीक्षा को लेकर छात्रों की जो भावनाएं हैं, वही उनकी भी हैं। उनके मुताबिक परीक्षा पर लोगों का भरोसा कायम रहना चाहिए। उन्होंने कहा, "विद्यार्थी ढोर-मवेशी नहीं हैं कि किसी के भी पीछे चले जाएं।" इसी बात के साथ उन्होंने कहा कि आंदोलन में बैठे छात्रों पर कोई भी राजनीतिक पार्टी या नेता मालिकाना हक न जताए।
सदावर्ते ने यह भी कहा कि आयोग के कामकाज की जिन्हें जानकारी है, वही उस पर बोलें। उन्होंने कुछ लोगों की आलोचना की और कहा कि इन लोगों को मामले की जानकारी नहीं है, फिर भी वे बोल रहे हैं।
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप की जगह असली सवाल पर बात होनी चाहिए, यह सदावर्ते का रुख रहा। उन्होंने सीधे चेतावनी देते हुए कहा, "महाराष्ट्र के MPSC छात्रों पर मालिकाना हक मत जताइए। अपनी मनहूस राजनीति मत कीजिए।" उन्होंने यह दावा भी किया कि छात्रों का एक प्रतिनिधिमंडल मुख्यमंत्री के पास गया था, बातचीत हुई थी और कुछ मुद्दों पर सहमति बन गई थी।
आंदोलन कर रहे छात्रों से सदावर्ते ने अपील की कि वे परीक्षा की तैयारी और आगे के लक्ष्य पर ध्यान दें। उन्होंने कहा, "हम यहां खाना खाने नहीं आए हैं, अफसर बनने आए हैं।"
इसके साथ ही उन्होंने कुछ सवाल भी उठाए। परीक्षा समय पर हो, इसकी ठीक-ठीक जिम्मेदारी किसकी है? इस प्रक्रिया में सरकार के पास कितने अधिकार हैं? और आयोग के काम करने के तरीके पर चर्चा क्यों नहीं होती?
सदावर्ते के मुताबिक आयोग के लोगों को हटाने की मांग से ज्यादा जरूरी यह है कि आयोग की परीक्षा पद्धति, उसके कामकाज के तरीके और छात्रों के परीक्षा पर भरोसे जैसे मुद्दों पर बात हो। इस तरह पुणे के MPSC आंदोलन को अब राजनीतिक समर्थन के साथ-साथ अलग-अलग भूमिकाओं और आरोप-प्रत्यारोप का रंग भी मिल गया है।
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