उधार लिया पैसा लौटाने में लोग क्यों करते हैं आनाकानी, जानिए इसके पीछे की मानसिकता
उधार लिए पैसे न लौटाने के पीछे आर्थिक तंगी, अपराधबोध या जिम्मेदारी से बचने की आदत हो सकती है।
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मुश्किल वक्त में हम किसी दोस्त, रिश्तेदार या जान-पहचान वाले को पैसे उधार दे देते हैं। उस वक्त सामने वाला जल्दी लौटाने का वादा करता है। लेकिन तय समय निकल जाने के बाद भी पैसे वापस नहीं आते। फोन उठाना बंद हो जाता है, नए बहाने सुनने को मिलते हैं या बार-बार और वक्त मांगा जाता है। तब सवाल उठता है कि क्या वह आदमी पैसे न होने की वजह से नहीं लौटा रहा, या उसके बर्ताव के पीछे कोई मानसिक वजह है?
मनोविज्ञान के हिसाब से कुछ लोग अपनी जरूरतों को ज्यादा अहमियत देते हैं। पैसे लेते वक्त उन्हें अपनी परेशानी बड़ी लगती है, लेकिन लौटाने की बारी आती है तो सामने वाले की जरूरत छोटी लगने लगती है। इसे खुदगर्ज सोच कहा जा सकता है। हर कोई ऐसा नहीं करता, पर कुछ लोग अपने फायदे के लिए दूसरे के भरोसे को नजरअंदाज कर देते हैं।
कुछ लोगों की आर्थिक हालत सचमुच बिगड़ी होती है। पैसे न लौटा पाने की वजह से उन्हें अपराधबोध, शर्म या तनाव महसूस होता है। सामने वाले से बात करके हालात बताने के बजाय वे फोन टालते हैं या संपर्क कम कर देते हैं। इसे बचने की मानसिक प्रवृत्ति कहा जाता है। मगर इस तरह मसला हल नहीं होता, उलटे भरोसा घटता है।
कुछ लोग पैसों की प्लानिंग नहीं कर पाते। आज की जरूरत पूरी करने के लिए वे उधार ले लेते हैं, पर लौटाने के लिए बचत नहीं करते। तय तारीख आती है तो नया बहाना सामने आ जाता है। अगर पहले भी देर से पैसे लौटाने पर कोई गंभीर नतीजा नहीं भुगतना पड़ा, तो यह आदत और बढ़ सकती है।
कई बार दोस्ती, रिश्ते या भावनात्मक नजदीकी का फायदा भी उठाया जाता है। उन्हें पता होता है कि सामने वाला रिश्ता बिगड़ने के डर से बार-बार माफ करेगा और मोहलत बढ़ा देगा। ऐसे में पैसे न लौटाना सिर्फ आर्थिक तंगी नहीं, जिम्मेदारी से बचने का बर्ताव भी हो सकता है।
तो ऐसे हालात में क्या करें? पैसे देते वक्त लौटाने की तारीख और रकम साफ तय करें। अगर पैसे वापस नहीं मिल रहे, तो शांति से लेकिन दृढ़ता के साथ लिखित संदेश भेजें और लौटाने का शेड्यूल तय करें। सामने वाले की परेशानी समझना अच्छी बात है, पर अपनी आर्थिक जरूरतों और सीमाओं को नजरअंदाज न करें। याद रखें कि पैसे न लौटाने के पीछे हर बार बुरी नीयत नहीं होती। फिर भी बार-बार वादे के बाद भी कुछ न हो, तो बातों से ज्यादा बर्ताव पर ध्यान देना जरूरी है।
कारण हर व्यक्ति के मामले में अलग हो सकता है: आर्थिक तंगी, पैसों की प्लानिंग न करना, अपराधबोध, टकराव का डर या जिम्मेदारी से बचने की आदत। वादे बार-बार तोड़ना, लौटाने के बारे में साफ जवाब न देना, संपर्क टालना और तय शेड्यूल न निभाना चिंता के संकेत हैं। फिर भी सिर्फ एक बात से किसी की नीयत तय नहीं की जा सकती।
पैसे वापस पाने के लिए लिखित संदेश भेजकर बकाया रकम और लौटाने की तारीख साफ करें। जरूरत हो तो किस्तों का विकल्प दें। फिर भी पैसे न मिलें, तो मौजूद सबूत संभालकर रखें और हालात के हिसाब से कानूनी सलाह लें।