तीन दिन में अमेरिकी बिटकॉइन ETF में 1 बिलियन डॉलर से ज्यादा आए, फिर भी बिटकॉइन फिसला
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
अमेरिका के स्पॉट बिटकॉइन ETF में 19 से 21 अक्टूबर के बीच 1 बिलियन डॉलर से ज्यादा का नेट निवेश आया, लेकिन इसके बाद बिटकॉइन की कीमत नीचे आ गई।
अमेरिका के स्पॉट बिटकॉइन ETF में 19 से 21 अक्टूबर के तीन सेशन में 1 बिलियन डॉलर से ज्यादा का नेट निवेश आया। फंड में पैसे की यह नई मांग क्रिप्टोकरेंसी की खबरों में सबसे ज्यादा चर्चा में है। लेकिन इसके बाद बिटकॉइन की कीमत नीचे आ गई। इससे दिखता है कि फंड में ज्यादा पैसा आना और कीमत में लगातार तेजी, ये दोनों हमेशा साथ-साथ नहीं चलते।
असल सवाल यह है कि इन दोनों संकेतों को एक साथ कैसे पढ़ा जाए। ETF में आने वाला पैसा सिर्फ एक खास रास्ते से आई मांग को नापता है। बिटकॉइन की कीमत पूरे बाजार का हाल बताती है, जहां यह मांग बिकवाली, बदलती उम्मीदों और अलग-अलग अवधि के सौदों से टकराती है।
फार्साइड इन्वेस्टर्स के आंकड़ों के मुताबिक 19 अक्टूबर को 526.7 मिलियन डॉलर, 20 अक्टूबर को 23.2 मिलियन डॉलर और 21 अक्टूबर को 524.8 मिलियन डॉलर का नेट निवेश आया। तीनों दिन मिलाकर 1,074.7 मिलियन डॉलर हुए, यानी करीब 1.075 बिलियन डॉलर। यानी लगभग पूरी रकम दो बड़े दिनों में आई, और बीच में एक बहुत छोटा पॉजिटिव दिन रहा। इसलिए इसे मांग का लौटना कहा जा सकता है, रोज बढ़ती रफ्तार नहीं।
ये आंकड़े एक तय अवधि के हैं। इन्हें ऐसे तीन दिन के कुल योग से नहीं मिलाना चाहिए जो हर नए अमेरिकी सेशन के साथ बदलता रहता है। तारीख साथ रखने से अलग-अलग टाइम जोन में छपी रिपोर्टों की तुलना भी आसान हो जाती है।
21 अक्टूबर को ब्लैकरॉक के IBIT में 235 मिलियन डॉलर और फिडेलिटी के FBTC में 212.7 मिलियन डॉलर आए। दोनों का जोड़ 447.7 मिलियन डॉलर रहा, जो उस दिन के कुल नेट निवेश का करीब 85 फीसदी है। बाकी हिस्सा दूसरे फंडों से आया। इससे पता चलता है कि बड़ा आंकड़ा कई फंडों में फैली मांग से भी बन सकता है और चंद प्रोडक्ट में सिमटी गतिविधि से भी। IBIT और FBTC के आंकड़े बताते हैं कि मांग फंड बाजार में कहां दिख रही है, लेकिन ये हर निवेशक की पहचान नहीं बताते और न यह कि हर रकम क्यों लगाई गई। संस्थागत मांग इस चर्चा का हिस्सा है, पर सिर्फ कुल फ्लो से संस्थागत और रिटेल निवेशकों को अलग नहीं किया जा सकता।
फ्लो की रिपोर्ट बिटकॉइन के विश्लेषण का सिर्फ एक हिस्सा है। यह फंड में आया नेट पैसा दिखाती है, बिटकॉइन के हर सौदे या बिकवाली के हर दबाव को नहीं। टर्नओवर अलग चीज है। मौजूदा ETF यूनिट में भारी कारोबार हो सकता है, भले ही उतना नया पैसा फंड में न आया हो। वॉल्यूम, नेट निवेश और असेट अंडर मैनेजमेंट को तीन अलग संकेतक मानकर चलना बेहतर है, ताकि एक ही गतिविधि दो बार न गिनी जाए। फंड के असेट की वैल्यू भी बिना उतने नए निवेश के बढ़ सकती है, अगर उसके पास रखी चीजों की कीमत चढ़ जाए। भारत का NSE अपनी तकनीकी गाइड में यूनिट बनने और रिडेम्पशन की भूमिका समझाता है।
22 अक्टूबर को एशियाई सेशन में बिटकॉइन 83,000 डॉलर के नीचे चला गया। यानी फंड में मजबूत मांग के बावजूद कीमत गिर सकती है। बाजार में दूसरी जगह की बिकवाली, लीवरेज वाले सौदों में बदलाव या जोखिम लेने की भूख में कमी, ये सब फंड की मांग को बेअसर कर सकते हैं। सिर्फ फ्लो के आंकड़ों से यह नहीं बताया जा सकता कि किसी चाल के पीछे कौन-सी वजह थी।
भारतीय पाठकों के लिए तुलना का एक पक्का आधार भी जरूरी है। BTC USD बिटकॉइन की डॉलर कीमत है, जबकि रुपये की कीमत में डॉलर भाव और USD/INR की दर दोनों शामिल होते हैं। एक में बदलाव का मतलब यह नहीं कि दूसरे में उतना ही फीसदी बदलाव हुआ। फाइनेंशियल बेंचमार्क्स इंडिया ने अपने डॉलर-रुपया बेंचमार्क की गणना का तरीका बताया है। तारीख वाला करेंसी रेफरेंस लेने से रुपये के कन्वर्जन को बिटकॉइन की नई चाल बताने की गलती से बचा जा सकता है।
समय का फर्क भी है। बिटकॉइन की कीमत चौबीसों घंटे मिलती है, जबकि अमेरिकी स्पॉट ETF के फ्लो पूरे हो चुके अमेरिकी सेशन के होते हैं। इसलिए एशियाई सेशन की कीमत के साथ पहले की अवधि का फ्लो आंकड़ा रखा हो सकता है।
अब देखना यह है कि नया निवेश जारी रहता है या नहीं, और कीमत की रफ्तार उसके साथ मजबूत होती है या नहीं। और पॉजिटिव सेशन फंड की मांग का सबूत बढ़ाएंगे, जबकि कीमत में टिकाऊ बढ़त अलग सबूत होगी कि व्यापक खरीदारी उपलब्ध सप्लाई को सोख रही है। तीन दिन के कुल आंकड़े से इनमें से कोई भी नतीजा मान लेना ठीक नहीं होगा। लगातार रोज की रिपोर्ट, फंडों के बीच बंटवारा और उसी अवधि में बिटकॉइन की प्रतिक्रिया देखना किसी एक बड़े आंकड़े पर भरोसा करने से बेहतर तस्वीर देता है।
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